ज़की भारतीय ✍🏼
लखनऊ। शिया सेन्ट्रल वक़्फ़ बोर्ड के अधीन आने वाली ऐतिहासिक धार्मिक स्थल दरगाह हज़रत अब्बास (अ.स.) के मुतवल्ली पर गंभीर आरोप लग रहे है कि उन्होंने दरगाह परिसर के विशाल फर्श को अपने जीजा के द्वारा बनवाकर वक्फ़ को जहां करोड़ो का नुकसान पहुँचाया वहीं निर्माण के नाम पर अपने जीजा को बड़ा मुनाफ़ा करवाया। सूत्रों के अनुसार हज़ारों वर्ग फुट क्षेत्रफल में बिछाए गए इस प्रीमियम पॉलिश्ड ग्रेनाइट फर्श की कुल लागत लगभग ₹2 करोड़ तक आई है।विशेषज्ञों के अनुसार, अगर काम पारदर्शी तरीके से होता तो यही फर्श 2 करोड़ के बजाए 1 करोड़ 20 लाख रुपए में बन सकता था। यानी वक्फ़ को लगभग ₹ 80 लाख रुपए का सीधा नुकसान हुआ है। सूत्र बताते हैं कि इतने बड़े प्रोजेक्ट के लिए किसी बड़े समाचार पत्र में न तो निविदा निकाली गई और न ही कोई पब्लिक टेंडर। जैसा कि विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि मुतवल्ली ने काम अपने जीजा को सौंप दिया, जबकि जीजा न तो कोई इंजीनियर हैं और न ही कोई रजिस्टर्ड ठेकेदार। इतना बड़ा काम या तो अनुभवी और रजिस्टर्ड ठेकेदारों से करवाया जाना चाहिए था या फिर दरगाह प्रशासन को अपना इंजीनियर रखकर पूरा काम स्वयं करवाना चाहिए था। उस स्थिति में जो मुनाफ़ा जीजा की जेब में गया, वह सीधे दरगाह ट्रस्ट के खाते में आता और वक्फ़ की बड़ी राशि बच जाती। फर्श की खासियत भी सवालों के घेरे में है। फर्श का मोटा बेस (गिट्टी, बालू और सीमेंट) के ऊपर ₹150 प्रति वर्ग फुट वाले पॉलिश्ड ग्रेनाइट लगाए गए। पॉलिश्ड सतह चमकदार तो है, लेकिन जायरीन के लिए बेहद फिसलन भरी। पहले जो गुम्मा वाली सड़क थी, उसमें किसी को कोई परेशानी नहीं होती थी। अगर उसी तरह के सस्ते और नॉन-स्लिप (मैट या होनेड फिनिश) पत्थरों का इस्तेमाल किया जाता, जो ₹80-100 प्रति वर्ग फुट में उपलब्ध हैं, तो न केवल लागत आधी रहती बल्कि जायरीन के लिए सुरक्षित भी होता।दरगाह प्रशासन ने अकीदतमंदों के कीमती चढ़ावे और वक्फ़ की संपत्ति का दुरुपयोग कर बिना किसी ज़रूरत के इतनी भारी रकम सड़क पर बहा दी। जबकि पुरानी गुम्मा वाली सड़क बिल्कुल ठीक काम कर रही थी।विशेषज्ञों का अनुमान है कि अगर बेस की मोटाई उचित (4-6 इंच) रखी जाती, सस्ता और एंटी-स्लिप ग्रेनाइट चुना जाता तथा लोकल ठेकेदारों से टेंडर के ज़रिए काम करवाया जाता तो पूरा प्रोजेक्ट ₹1.20 करोड़ से भी कम में निपट जाता। लेकिन मुतवल्ली के फैसले ने न सिर्फ़ वक्फ़ को भारी आर्थिक नुकसान पहुँचाया, बल्कि जायरीन की सुरक्षा को भी दाँव पर लगा दिया।दरगाह के ज़िम्मेदारों से जब इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने अभी तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। वक्फ़ बोर्ड और प्रशासन को इस पूरे मामले की जाँच करनी चाहिए ताकि पता चल सके कि वक्फ़ की आमदनी का दुरुपयोग हुआ या नहीं। दरगाह हज़रत अब्बास अस का काम अगर किसी इंजीनियर को लगाकर या समाचार पत्रों में टैंडर निकाल कर करवाया जाता तो काम सस्ते में निपट जाता ओर मीसम के बहनोई द्वारा कराये गए काम से कहीं अच्छा होता ।
अगर टेंडर होता तो ठेकेदार एक स्पेसिफिकेशन देते जिसमें हर चीज़ लिखी होती है। कितने इंच जमीन ऊंची होगी,कितने इंच का प्लास्टर होगा,कौन सी गिट्टी मिलाई जाएगी, कितनी मौरंग ओर बालू लगेगी,अंदर कितनी सीमेंट इस्तेमाल होगी इन सारी बातों को सार्वजनिक करना चाहिए था ।और उसके बाद टेंडर डालने पर भी लोगों की मीटिंग करना चाहिए थी ,मीटिंग करके बताना चाहिए था कि हम यह काम करना चाह रहे हैं। लखनऊ के तमाम मोमिनीन को बुलाना चाहिए था ।जैसे तामीर के लिए चंदे की टेबल लगती है और माइक पर बताया जाता है कि किस मद के लिए चंदा मांगा जा रहा है ? लोगों का कहना है कि मुतवल्ली ने इतना बड़ा काम अपने बहनोई की किस्से पूछकर दिया ? लोगों ने कहा कि मीसम के बहनोई जब रजिस्टर्ड ठेकेदार भी नहीं थे, और ना ही वह इंजीनियर या आर्किटेक्ट थे तो आखिर उन्होंने काम लिया क्यों और देने वालों ने यह काम दिया क्यों ? अगर ये काम किसी और को दिया जाता तो वो इस काम में 30 से 40% परसेंट बचाता और दरगाह कमेटी यदि खुद करवाती तो 60 लाख से 80 लाख रुपए की दरगाह की बचत होती।



