ज़की भारतीय ✍🏼
लखनऊ। हज़रत अब्बास अस की दरगाह शहर की एक प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर है। यहां हर रोज सैकड़ों ज़ायरीन मन्नतें मांगने, दुआएं करने और रौज-ए-मुबारक पर सजदा करने आते हैं। विगत कई वर्षों से दरगाह प्रशासन द्वारा बाहर के मैदान को खूबसूरत और हसीन बनाने का काम चल रहा है। मगर इस ‘सुंदरता’ की कीमत जायरीन को चोटों और फिसलन के रूप में चुकानी पड़ रही है। 2 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करके लगाए गए चिकने पत्थर अब दरगाह परिसर में रोजाना दुर्घटनाओं का सबब बन गए हैं। लोग गिर रहे हैं, चोटिल हो रहे हैं और दरगाह प्रशासन पर मनमानी का आरोप लग रहा है।

दरगाह के बाहर का मैदान पहले ज़ायरीनों के वाहनों के लिए पार्किंग के रूप में इस्तेमाल होता था। परिसर को इसी उद्देश्य से बनाया गया था कि श्रद्धालु अपना वाहन अंदर खड़ा करके बिना किसी परेशानी के दरगाह में प्रवेश कर सकें। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दरगाह प्रशासन ने लोगों के घरों के रास्ते बैरिकेड करके बंद कर दिए था।लोगों को दरगाह परिसर से आना जाना बंद करना पड़ गया था । हालांकि बाद में पर्दे रूप से बंद किए गए रास्ते को खोलना पड़ा था। अब तीनों मुख्य गेटों पर सख्त बंदिशें लगा दी गई हैं। पहले गेट को चेन लगाकर बंद रखा जाता है, दूसरे गेट पर इतनी भारी बैरिकेडिंग है कि कार अंदर नहीं घुस सकती, जबकि तीसरे गेट पर भी बैरिकेडिंग और सीढ़ियां बनी हुई हैं जिससे मोटरसाइकिल का आना-जाना बेहद मुश्किल हो गया है। नतीजतन, अब अंदर आने-जाने का एकमात्र साधन मोटरसाइकिल रह गया है। कारें तो सरकारी सड़कों पर ही खड़ी हो रही हैं। इससे दरगाह रोड पर लगातार जाम लगता है। दुकानदार सड़क पर सामान निकालकर रख रहे हैं, हाई कोर्ट के नियमों का उल्लंघन हो रहा है, लेकिन सआदतगंज पुलिस चुप्पी साधे बैठी है।
जब दरगाह में यह सिस्टम नहीं था, तब जायरीनों की गाड़ियां अंदर ही पार्क होती थीं। लोगों का कहना है कि धार्मिक स्थल की पार्किंग का इस्तेमाल सरकारी सड़क पर क्यों किया जा रहा है? यह उसूलों के खिलाफ है। दरगाह परिसर को जायरीनों की सुविधा के लिए बनाया गया था, न कि सेल्फी पॉइंट बनाने के लिए। मगर आज वही परिसर सेल्फी पॉइंट बन गया है। लोग फोटो खिंचवाने आते हैं, मगर इबादत और एहतराम का माहौल खत्म हो गया है।
सबसे बड़ी समस्या फर्श की है। दरगाह प्रशासन ने यहां 2 करोड़ रुपये से ज्यादा के चिकने पत्थर लगाए हैं। ये पत्थर इतने चिकने हैं कि जूते पहने लोग, खासकर महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और मोटरसाइकिल सवार आसानी से फिसल जाते हैं। सूत्रों के मुताबिक रोजाना 10 से 15 लोग इस फर्श पर गिरकर चोटिल हो रहे हैं। कुछ लोग हल्की चोट से बच जाते हैं, तो कुछ को गंभीर चोटें आती हैं। मोटरसाइकिल से आने वाले लोग ब्रेक लगाते ही फिसल पड़ते हैं। पैदल चलने वालों में भी फिसलन आम है।

इसी फर्श पर आज एन एस लाइव न्यूज़ के ब्यूरो चीफ ज़की भारती खुद इस हादसे का शिकार हुए। शाम 5:30 से 6:00 बजे के बीच मोटरसाइकिल चलाते हुए उन्होंने हल्का ब्रेक लगाया और फिसलकर गिर पड़े। वे ओपन हार्ट सर्जरी करा चुके हैं और ब्रेन हेमरेज का भी सामना कर चुके हैं। ऐसी स्थिति में अगर उन्हें फिर गंभीर चोट लगती तो बड़ा नुकसान हो सकता था। यह घटना सिर्फ एक उदाहरण है। सैकड़ों जायरीन रोज इसी फर्श पर फिसल रहे हैं।
जायरीनों का आरोप है कि जब काम शुरू हुआ था तो प्रशासन ने खुद वादा किया था कि ऐसे पत्थर नहीं लगाए जाएंगे जिन पर लोग फिसलें। मगर फिर भी वही चिकने पत्थर लगा दिए गए। लोगों का कहना है कि ठेकेदार को लंबा लाभ पहुंचाने के लिए महंगे पत्थर चुने गए। जबकि स्लिप न होने वाले साधारण पत्थर भी उपलब्ध थे। लाल रंग के एंटी-स्लिप पत्थर, टेक्स्चर्ड पत्थर या अन्य नॉन-स्लिप सामग्री लगाई जा सकती थी। 2 करोड़ रुपये बर्बाद करके जायरीनों को चोटिल करवाने की जिम्मेदारी दरगाह कमेटी की है।
दरगाह कमेटी के पास आने वाला पैसा जायरीनों की नजर-नियाज और चंदे का पैसा है। इसे इस तरह बर्बाद करना और मोमिनीन को खुद चोटिल करवाना निंदनीय है। पहले ही विवाद हो चुका था। लोगों ने चेतावनी दी थी कि ऐसे पत्थर न लगाएं, मगर प्रशासन ने अनसुना कर दिया।
तुलना करें तो लखनऊ के अन्य प्रमुख धार्मिक स्थलों में ऐसी समस्या नहीं है। कर्बला दियानतुद्दौला, मल्का जहां की कर्बला, शाह नजफ का इमामबाड़ा, हजरतगंज का सिब्तैनाबाद इमामबाड़ा, हुसैनाबाद का छोटा इमामबाड़ा, हुसैनाबाद का बड़ा इमामबाड़ा, ताल कटोरा की कर्बला और रौज़ा-ए-कजमान जैसे स्थानों पर फर्श साधारण और सुरक्षित है। वहां न फिसलन है, न गिरने की शिकायतें। जायरीनों को मोटरसाइकिल या पैदल आने-जाने में कोई परेशानी नहीं होती। पार्किंग का उचित इंतजाम होता है। मगर हजरत अब्बास की दरगाह में यही सुविधाएं छीन ली गई हैं।
दरगाह प्रशासन को तुरंत संज्ञान लेना चाहिए। मुख्य द्वार से लेकर आखिरी छोर तक एंटी-स्लिप पत्थर लगाने चाहिए। अगर 2 करोड़ के पत्थर बदलने में समस्या है तो कम से कम ऊपर की परत बदलकर फिसलन रोकनी चाहिए। जायरीनों की सुरक्षा पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। धार्मिक स्थल इबादत का केंद्र है, सेल्फी पॉइंट या ठेकेदारों की कमाई का साधन नहीं।
लोगों की मांग है कि दरगाह कमेटी सार्वजनिक सुनवाई करे, जायरीनों के सुझाव माने और फर्श की समस्या का स्थायी समाधान निकाले। साथ ही पार्किंग की पुरानी व्यवस्था बहाल की जाए ताकि सरकारी सड़कों पर जाम न लगे।
यह मुद्दा सिर्फ एक फर्श का नहीं है। यह धार्मिक स्थलों में जायरीनों के सम्मान, सुरक्षा और सुविधा का मुद्दा है। अगर हजरत अब्बास अस की दरगाह पर आने वाले जायरीन गिरकर चोट खा रहे हैं तो यह प्रशासन की बड़ी लापरवाही है। 2 करोड़ रुपये लगाकर फिसलन का मंजर तैयार करना और फिर जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लेना स्वीकार्य नहीं। दरगाह कमेटी को अब जिम्मेदारी लेनी होगी। जायरीनों की आवाज सुनी जानी चाहिए। वरना यह सुंदरता सिर्फ दिखावे की रहेगी और हकीकत में जायरीनों के लिए मुसीबत बनी रहेगी।
विगत दिनों रफीकुल हसन और वर्तमान मुतवल्ली मीसम रिजवी द्वारा आरोप प्रत्यारोप की वीडियो क्लिप वायरल हुई थी। जिसमें मीसम रिजवी ने अपने दौर में आमदनी का और एफ़ डी का भी उल्लेख किया था। दूसरी तरफ रफीकुल हसन ने भी एक प्रेस वार्ता करके अपनी सफाई पपेश की थी। यहां मैं दोनों के मामले पर एक शब्द लिखना नहीं चाहता। बहुत से ऐसे मुद्दे हैं जो अभी भी पहली बने हुए हैं लेकिन मै समझता हूं जो भी हो रहा है वह अच्छा हो रहा है । पहले रफीकुल हसन ने अंदर शीशे का काम करवाया ,जिसने दरगाह हज़रत अब्बास को मुख्य रूप से खूबसूरत बनाया उसने दरगाह हज़रत अब्बास अ स के अंदर काम किया लेकिन बाद में आए हुए मुतवल्ली मीसम रिजवी ने दरगाह हज़रत अब्बास में खुद अपने वीडियो में यह बात कही कि साढे चार साल रफीकुल हसन रहे और 4 साल उनके कार्यकाल को हो चुके हैं। इस 8.5 साल में उन्होंने दिखाया था,शीशे का आलम क्या हो चुका है? बारिश होती थी, छत पर बड़े-बड़े गढ्ढे थे और यह शीशे का आलम देख लीजिए कि शीशे अपनी जगह से उखड़ गए हैं ।तो मीसम रिजवी ने इस बात से जहां रफीकुल की कमजोरी को उजागर किया वहीं उन्होंने अपनी कमजोरी को भी साबित कर दिया।
क्योंकि साढे चार साल और 4 साल मिलकर लगभग 8.30 साल का समय होता है । मीसम रिजवी ने दरगाह के अंदर जो शीशे दिखाए जो कुछ जगहों से झड़ गए थे,आखिर उन्होंने अपने समय में उसकी रिपेयरिंग क्यों नहीं करवाई ?
क्या दरगाह के ये मुतवल्ली नहीं। थे ? क्या अंदरून ए दरगाह की मीसम रिज़वी की कोई जिम्मेदारी नहीं थी ? अगर थी तो उनको उसकी रिपेयरिंग करवाना चाहिए थी।अगर ऐसा किया होता तो आज दरगाह के अंदर खूबसूरती में और इज़ाफ़ा होता।
हालांकि लोगों ने पूर्व मुतवल्ली रफीकुल द्वारा किए गए कामों की भी सराहना की और जो वर्तमान मुतवल्ली मीसम रिजवी द्वारा किए कामों को भी सराहा,और सराहा जाना भी चाहिए था।
मीसम रिजवी ने अपनी वीडियो क्लिप में भी सोने और चांदी की बात की और उन्होंने कहा कि मेरे समय में करोड़ों रुपए आए । जाहिर है जब काम होता है तो मोमिनीन भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते हैं लेकिन जो पैसा मोमिनीन दे रहे हैं वो सही काम में लगे। सड़क पर फर्श बिछाने में 2 करोड़ खर्च करना, क्या मोमिनीन के पैसे का सही इस्तेमाल है ?
बाहर के शुरू किए गए काम की ऐसी कोई खास जरूरत नहीं थी । दरगाह का इतिहास है कि जो मैदान बाहर था वह हमेशा से ऐसे ही चल रहा था उसमें आग का मातम भी होता था, ना कोई फिसलता था ना ,कोई गिरता था ।
लेकिन दरगाह की सुंदरता का जो काम किया वह रफीकुल हसन के ही कार्यकाल में किया गया । यह सच है और खुद मीसम रिजवी ने अपनी वीडियो जो वायरस की थी उससे ये साबित होता है।
सूत्रों की मानें तो,जो पार्किंग ज़नानी दरगाह के पास में बनाई गई है वहां तक हर जायरीन अपनी गाड़ी खड़ी नहीं कर सकता। कारण यह है कि बहुत से फोर व्हीलर से आने वाले लोग ऐसे होते हैं कि किसी के पिता बीमार हैं,किसी की मां ,किसी के भाई बीमार है तो किसी की खाला,किसी के चचा बीमार हैं तो किसी की फूपी,किसी को खुद ही चलने में परेशानी है। तो वह इतनी दूर गाड़ी खड़ी करके पैदल आए उनके लिए मुश्किल हो जाता है।
जो पार्किंग है वहां वहीं गाड़ियां पार्क करते हैं जो खुद चल सकते हैं, पैदल आ जा सकते हैं। लेकिन उन लोगों के लिए बहुत बड़ी परेशानी है जिनके लिए चलना फिरना बहुत मुश्किल
है। पहली जायरीन आराम से दरगाह के अंदर आते थे, कैंपस में गाड़ी खड़ी करते थे और मौला अब्बास अस के रोज़े की जियारत करते थे और सुकून से चले जाते थे । दरगाह प्रशासन को इसका संज्ञान लेते हुए पुरानी व्यवस्था को भी बहाल करना चाहिए। दरगाह कमेटी जायरीन के हितों के लिए होती है अपनी मनमानी के लिए नहीं। इसलिए पुरानी व्यवस्था को बहाल किया जाना अति आवश्यक है।



