HomeCITYजश्न-ए-ईद-ए-ग़दीर वा मुबाहेला के विषय पर ऑल इंडिया महफ़िल-ए-मकासेदा कल

जश्न-ए-ईद-ए-ग़दीर वा मुबाहेला के विषय पर ऑल इंडिया महफ़िल-ए-मकासेदा कल

लखनऊ, 20 जून। तंजीम-ए- पैग़ाम-ए-ग़दीर के तत्वावधान में जश्न-ए-ईद-ए-ग़दीर वा मुबाहेला के अवसर पर ऑल इंडिया महफिल-ए- मकासेदा का भव्य आयोजन होने जा रहा है। यह धार्मिक महफिल 24 जिलहिज्जा, यानी 21 जून 2025, शनिवार को शाम 9 बजे से मालकाकेश्वर मस्जिद, कश्मीरी मोहल्ला रोड, लखनऊ में मुनाकिद होगी। इस आयोजन का मकसद ग़दीर-ए-खुम की ऐतिहासिक घटना को याद करना, विलायत-ए-अली का पैग़ाम फैलाना, और पंजतन-ए-पाक की फज़ीलत को जन-जन तक पहुंचाना है। महफ़िल की सदारत, सरपरस्ती और मेहमान-ए-खुसूसी के लिए तंजीम-ए-पैगाम-ए-ग़दीर की जानिब से एक खास कुर्सी बनवाई गई है, जो विशेष रूप से इस महफ़िल के लिए इस्तेमाल की जाती है। इस कुर्सी पर 30 से 35 किलो वजन का एक खूबसूरत गुलाब के फूलों का हार सजाया जाता है, जिस पर मोमिनीन इत्र आदि लगाकर दुआएँ माँगते हैं। यह कुर्सी पूरी महफ़िल में अपनी अलग पहचान रखती है, क्योंकि आमतौर पर इस तरह के प्रोग्रामों में लोग किसी साधारण व्यक्ति को मेहमान-ए-खुसूसी बनाते हैं, सदारत करवाते हैं या किसी आम व्यक्ति के ज़ेरे-सरपरस्ती में महफ़िल का आयोजन करते हैं। लेकिन इस महफ़िल में शियों के आखिरी इमाम को इन तमाम ओहदों से नवाज़ा जाता है, और उनके लिए ही यह विशेष कुर्सी सजाकर रखी जाती है। इसके अलावा, इस महफ़िल की निज़ामत नय्यर मजीदी साहब करेंगे, जबकि महफ़िल के कन्वीनर के रूप में ज़की भारती को चुना गया है। यह महफिल विशेष रूप से उन लोगों के लिए है, जो विलायत-ए-अली पर यकीन रखते हैं और पंजतन-ए-पाक की फज़ीलत को क़ुबूल करते हैं। जो लोग इस अक़ीदे के मुखालिफ हैं, वह इस महफिल से दूरी बनाए रखते हैं, और उन्हें ऐसा करना चाहिए। हालांकि, जो लोग विलायत की अहमियत को समझना चाहते हैं, उनके लिए इस महफिल में शिरकत का खुला न्योता है।

महफिल का आग़ाज़ और कार्यक्रम

महफिल की शुरुआत पवित्र कुरआन की तिलावत से होगी, जिसे मशहूर कारी मुबारक हुसैन ज़ैदी साहब अंजाम देंगे। इसके बाद मौलाना मीसम जैदी साहब महफिल को खिताब करेंगे। जिसमें वो ग़दीर-ए- खुम की घटना और पंजतन-ए-पाक की शान को बयान करेंगे। इस अवसर पर मशहूर शायर अपनी रचनाओं के माध्यम से नज़्राना-ए-अक़ीदत पेश करेंगे। कुछ शायरों के नामों में पहले हुई त्रुटि को सुधारते हुए, आयोजकों ने बनारस के मशहूर शायर रोशन बनारसी, आरिफ अकबराबादी, और मौलाना हुसैनी के नाम शामिल किए हैं।
महफिल का समापन बजरिया कुरआंदाज़ी (लॉटरी सिस्टम) के जरिए होगा, जिसमें मौजूद श्रोताओं के बीच 100 कुर्ते-पजामे और अन्य इनअमात तक्सीम किए जाएंगे। यह लॉटरी सिस्टम महफिल में मौजूद लोगों के लिए खुशी का मौका होगा, और आयोजकों ने इस अवसर को और यादगार बनाने के लिए विशेष इंतिज़ाम किए हैं।

ईद-ए-ग़दीर का महत्व

ईद-ए-ग़दीर वह पावन अवसर है, जो ग़दीर-ए-खुम की उस ऐतिहासिक घटना को याद करता है, जब रसूल-ए-खुदा (स.अ.व.) ने हज़रत अली (अ.स.) को अपना उत्तराधिकारी और मोमिनीन का वली घोषित किया। रसूल-ए-खुदा ने फरमाया, “मन कुन्तु मौलाहु फ हाज़ा अलीयुन मौलाहु” (जिसका मैं मौला हूँ, उसका यह अली मौला है)। यह ऐलान इस्लाम में विलायत के उसूल को स्थापित करता है, जो शिया समुदाय के लिए ईमान का आधार है।

मौलाना मीसम जैदी साहब डालेंगे “मुबाहेला” की फज़ीलत पर रौशनी 

मौलाना मीसम जैदी साहब अपने खिताब में पंजतन-ए-पाक—रसूल-ए-खुदा (स.अ.व.), हज़रत अली (अ.स.), जनाबे फातिमा ज़हरा (स.अ.), हज़रत इमाम हसन (अ.स.), और हज़रत इमाम हुसैन (अ.स.)—की फज़ीलत पर रौशनी डालेंगे। इसके साथ ही, वह “मुबाहेला” की घटना का भी ज़िक्र करेंगे, जो पंजतन-ए-पाक की आध्यात्मिक महानता को दर्शाती है। मुबाहेला के दौरान, जब रसूल-ए-खुदा ने नजरान के ईसाइयों के सामने पंजतन-ए-पाक को पेश किया, तो उनकी शक्ति और पवित्रता को देखकर नजरान के प्रतिनिधियों ने मुबाहेला से पीछे हटना बेहतर समझा। यह घटना इस्लामी इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

विलायत का मफहूम और इसकी अहमियत

विलायत, इस्लाम में एक ऐसा उसूल है, जो हज़रत अली (अ.स.) की इमामत और रसूल-ए-खुदा के बाद उनकी रहनुमाई को क़ुबूल करने का प्रतीक है। ग़दीर-ए-खुम की घटना ने इस मफहूम को स्पष्ट रूप से दुनिया के सामने रखा। यह महफिल उन लोगों के लिए आयोजित की जा रही है, जो विलायत-ए-अली पर यकीन रखते हैं और पंजतन-ए-पाक की फज़ीलत को समझते हैं। साथ ही, यह उन लोगों के लिए भी एक सुनहरा अवसर है, जो विलायत की अहमियत को गहराई से जानना चाहते हैं। आयोजकों ने स्पष्ट किया है कि यह आयोजन केवल उन लोगों के लिए है, जो इस अक़ीदे को क़ुबूल करते हैं या इसे समझने की इच्छा रखते हैं।

आयोजन की तैयारियां और अपील

तंजीम-ए-पैग़ाम-ए-ग़दीर की कमेटी ने महफिल के लिए तमाम इंतिज़ामात पूरे कर लिए हैं। आयोजन स्थल को खूबसूरती से सजाया गया है, और श्रोताओं की सुविधा के लिए सभी ज़रूरी व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं। कमेटी ने मोमिनीन से अपील की है कि वह कसीर तादाद में इस महफिल में शिरकत करें और ग़दीर के पैग़ाम को समझने का आध्यात्मिक लाभ उठाएं। खास तौर पर उन लोगों को आमंत्रित किया गया है, जो विलायत-ए-अली और पंजतन-ए-पाक की फज़ीलत को समझना चाहते हैं।

जश्न-ए-ग़दीर का पैग़ाम

जश्न-ए-ईद-ए-ग़दीर एक विशुद्ध धार्मिक आयोजन है, जो ग़दीर-ए-खुम की याद को ताज़ा करता है और पंजतन-ए-पाक के पैग़ाम-ए-मोहब्बत, इंसाफ, और इंसानियत को फैलाता है। यह महफिल उन लोगों के लिए है, जो विलायत-ए-अली को क़ुबूल करते हैं और इस्लाम के सच्चे उसूलों को अपने जीवन में उतारना चाहते हैं। यह आयोजन न केवल आध्यात्मिक जागरूकता का प्रतीक है, बल्कि एक ऐसा मंच भी है, जो विलायत के पैग़ाम को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का ज़रिया है।
तंजीम-ए-पैग़ाम-ए-ग़दीर की ओर से सभी मोमिनीन को इस पावन अवसर पर शिरकत की दावत दी जाती है। यह जश्न-ए-ईद-ए-ग़दीर एक ऐसा मौका है, जो हमें इस्लाम के सच्चे पैग़ाम को समझने और अपनाने की प्रेरणा देता है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read