ज़की भारतीय
लखनऊ, 6 जून । उत्तर प्रदेश में खाद्य एवं रसद विभाग के अंतर्गत संचालित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में कोटेदारों (राशन दुकानदारों) की मनमानी, रिश्वतखोरी, और भ्रष्टाचार की समस्या आज भी जस की तस बनी हुई है। यह समस्या न केवल गरीबों के राशन के हक को प्रभावित करती है, बल्कि सरकार की मुफ्त राशन वितरण योजना की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठाती है।
कोटेदारों की मनमानी: गरीबों के राशन में चोरी
उत्तर प्रदेश में कोटेदारों द्वारा गरीबों के राशन में चोरी और मनमानी कोई नई बात नहीं है। पहले मैनुअल सिस्टम में कोटेदार अपने मनमाफिक तरीके से राशन वितरण करते थे, जिसमें वे प्रत्येक यूनिट पर 1 से 2 किलोग्राम खाद्यान्न (गेहूं और चावल) कम देकर बाकी को कालाबाजारी में बेच देते थे। डिजिटल युग में इलेक्ट्रॉनिक पॉइंट ऑफ सेल (e-PoS) मशीनों और बायोमेट्रिक सत्यापन की शुरुआत के बाद यह दावा किया गया कि राशन चोरी की समस्या समाप्त हो जाएगी। हालांकि, वास्तविकता यह है कि चोरी का सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है।
चोरी का तरीका: कोटेदार अक्सर प्रत्येक यूनिट पर 1 से 2 किलो खाद्यान्न कम देते हैं। उदाहरण के लिए, यदि एक परिवार में 6 यूनिट हैं, तो उसे 30 किलो खाद्यान्न मिलना चाहिए, लेकिन कोटेदार केवल 18-20 किलो ही देता है। बचा हुआ खाद्यान्न कालाबाजारी में बेच दिया जाता है।
उपभोक्ताओं पर दबाव: कई कोटेदार उपभोक्ताओं को धमकी देते हैं या राशन देने से इनकार कर देते हैं। रायबरेली में एक कोटेदार पर राशन के बदले चाय की पत्ती जबरन थोपने का आरोप लगा, जिससे उपभोक्ताओं में भारी रोष देखा गया। वाराणसी के चौबेपुर थाना क्षेत्र में कोटेदार मीना सिंह पर राशन कम देने और विरोध करने पर धमकी देने का आरोप लगा। ग्रामीणों ने कई बार शिकायत की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत
कोटेदारों की मनमानी केवल उनकी व्यक्तिगत गलती नहीं है, बल्कि इसमें क्षेत्रीय खाद्य अधिकारियों (Area Food Officers), जिला पूर्ति अधिकारियों (DSO), और उच्च अधिकारियों की मिलीभगत भी शामिल है। सूत्रों के अनुसार, रिश्वतखोरी का एक संगठित तंत्र काम करता है, जिसे स्थानीय भाषा में “गेम” कहा जाता है। यह रिश्वत न केवल स्थानीय अधिकारियों तक सीमित है, बल्कि उच्च स्तर तक पहुंचती है।
रिश्वतखोरी का तंत्र: कोटेदारों को अधिक राशन कार्ड या यूनिट आवंटित करने के लिए रिश्वत ली जाती है। उदाहरण के लिए, नियमों के अनुसार एक कोटेदार को अधिकतम 800 कार्ड ही आवंटित किए जाने चाहिए, लेकिन कई कोटेदारों को 1500-2000 कार्ड तक दिए जा रहे हैं, जो नियमों का उल्लंघन है।
कुछ कोटेदारों को शिकायतों के बाद निलंबित किया जाता है, लेकिन रिश्वत देकर वे जल्द ही अपनी दुकानें पुनः शुरू कर लेते हैं। बरेली, आगरा, और मेरठ मंडलों में हुए खाद्यान्न घोटाले में सीआईडी की रिपोर्ट ने डीएसओ और एडीएम रैंक के अधिकारियों की मिलीभगत की पुष्टि की।
उन्नाव में कोटेदार अमरपाल पर अंगूठा लगवाकर राशन हड़पने का आरोप लगा, लेकिन सप्लाई इंस्पेक्टर की जानकारी के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई।
कमीशन और आर्थिक दबाव
कोटेदारों का तर्क है कि सरकार द्वारा दिया जाने वाला कमीशन इतना कम है कि वे ईमानदारी से काम करके अपनी आजीविका नहीं चला सकते। उत्तर प्रदेश में कोटेदारों को प्रति क्विंटल खाद्यान्न पर लगभग 70-100 रुपये कमीशन मिलता है। यदि एक कोटेदार 500 यूनिट (लगभग 25 क्विंटल खाद्यान्न) वितरित करता है, तो उसकी मासिक आय 1750-2500 रुपये तक सीमित रहती है।
घाटोली का कारण
गोदाम से कोटेदारों को कम मात्रा में खाद्यान्न दिया जाता है, जिसे “घाटोली” कहा जाता है। इस कमी को पूरा करने के लिए कोटेदार उपभोक्ताओं से कम राशन देकर कालाबाजारी करते हैं।
कालाबाजारी का नया तरीका
पहले कोटेदार बचे हुए खाद्यान्न को छोटे व्यापारियों को बेच देते थे। अब वे इसे नए प्लास्टिक के बोरों में पैक करके प्राइवेट गोदामों में भेजते हैं, जहां से इसे बाजार में बेचा जाता है। इस प्रक्रिया से कोटेदारों को लाखों रुपये की अवैध कमाई होती है।
डिजिटल सिस्टम और बायोमेट्रिक मशीनों का दुरुपयोग
बायोमेट्रिक सत्यापन और e-PoS मशीनों की शुरुआत का उद्देश्य राशन वितरण को पारदर्शी बनाना था। हालांकि, कोटेदारों ने इस सिस्टम का भी दुरुपयोग शुरू कर दिया है।
अंगूठा लगवाकर चोरी
कोटेदार उपभोक्ताओं से अंगूठा लगवाते हैं, लेकिन राशन कम देते हैं। e-PoS सिस्टम में दर्ज होता है कि पूरा राशन दिया गया, लेकिन वास्तव में उपभोक्ता को कम राशन मिलता है। कुछ मामलों में, कोटेदार बायोमेट्रिक सत्यापन को बायपास करने के लिए तकनीकी हेरफेर करते हैं, जैसे कि डुप्लिकेट अंगूठे के निशान का उपयोग।
गरीबों पर प्रभाव
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत उत्तर प्रदेश में गरीबों को मुफ्त राशन प्रदान करने की योजना लागू है। पात्र गृहस्थी राशन कार्ड धारकों को प्रति यूनिट 5 किलो खाद्यान्न (3 किलो गेहूं, 2 किलो चावल) और अंत्योदय कार्ड धारकों को प्रति कार्ड 35 किलो खाद्यान्न मिलना चाहिए। हालांकि, कोटेदारों की मनमानी के कारण गरीबों को उनका पूरा हक नहीं मिल रहा है।उपभोक्ताओं की शिकायतें: उपभोक्ता लगातार शिकायत करते हैं कि उन्हें कम राशन दिया जाता है या राशन के बदले अन्य वस्तुएं (जैसे चाय की पत्ती) थोपी जाती हैं।
शिकायतों पर कार्रवाई का अभाव
विभागीय अधिकारियों द्वारा शिकायतों पर औपचारिक जांच तो शुरू की जाती है, लेकिन ज्यादातर मामलों में कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। उपभोक्ताओं को “मैनेज” करने की सलाह दी जाती है, जिससे शिकायतें दब जाती हैं। क्षेत्रीय खाद्य अधिकारियों और खाद्य निरीक्षकों को नियमित रूप से राशन दुकानों का औचक निरीक्षण करना चाहिए।e-PoS मशीनों के डेटा की स्वतंत्र ऑडिटिंग की जाए ताकि यह सुनिश्चित हो कि राशन वितरण पारदर्शी है।
रिश्वतखोरी पर अंकुश
रिश्वतखोरी के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए एक स्वतंत्र जांच समिति गठित की जाए, जो सीधे मुख्य सचिव या मुख्यमंत्री के अधीन हो।कोटेदारों को अधिक यूनिट आवंटन की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाए।
कोटेदारों का कमीशन बढ़ाना
कोटेदारों का कमीशन बढ़ाया जाए ताकि वे कालाबाजारी की ओर न जाएं। अन्य राज्यों में प्रति क्विंटल 200 रुपये कमीशन दिया जाता है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह 70-100 रुपये है।
उपभोक्ता जागरूकता
उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों और शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया के बारे में जागरूक किया जाए। खाद्य एवं रसद विभाग की हेल्पलाइन (1800 180 0150, 1967, 14445) का प्रचार-प्रसार किया जाए।स्थानीय स्तर पर ग्राम पंचायतों और शहरी निकायों के माध्यम से शिकायत निवारण केंद्र स्थापित किए जाएं।
तकनीकी सुधार
बायोमेट्रिक सत्यापन को और मजबूत किया जाए, जैसे कि वास्तविक समय में राशन वितरण की निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरे और डिजिटल ट्रैकिंग सिस्टम।उपभोक्ताओं को राशन वितरण की रसीद अनिवार्य रूप से दी जाए, जिसमें दी गई मात्रा दर्ज हो।
कानूनी कार्रवाई:राशन चोरी और रिश्वतखोरी के दोषी कोटेदारों और अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जाएं।निलंबित कोटेदारों की दुकानों को स्थायी रूप से निरस्त किया जाए और नए कोटेदारों को पारदर्शी प्रक्रिया से चुना जाए। लखनऊ सहित उत्तर प्रदेश में कोटेदारों की मनमानी और भ्रष्टाचार की समस्या एक गंभीर चुनौती है, जो गरीबों के हक को छीन रही है। सरकार द्वारा मुफ्त राशन योजना लागू करने के बावजूद, कोटेदारों और अधिकारियों की मिलीभगत के कारण यह योजना पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पा रही है। यदि उच्च स्तर पर निष्पक्ष जांच और कठोर कार्रवाई की जाए, तो इस समस्या पर अंकुश लगाया जा सकता है। उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना और विभागीय प्रक्रियाओं को पारदर्शी बनाना इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।




