ज़की भारतीय
युद्ध का तीसरा हफ्ता चल रहा है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर बड़े हमले शुरू किए। सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या हुई, कई सीनियर कमांडर और अधिकारी शहीद हो गए। IRGC के मुख्यालय ध्वस्त, नौसेना के जहाज डूबाए गए, साउथ पार्स गैस फील्ड पर हमले, मिसाइल फैक्टरियां तबाह। इजरायल ने दावा किया कि 20 दिनों में ईरान की मिलिट्री क्षमता बुरी तरह कमजोर हो गई। अमेरिका ने ट्रूप्स और फाइटर जेट्स भेजे, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को क्लियर करने की कोशिश की।
लेकिन ईरान ने झुकने से इनकार कर दिया। जवाबी हमले तेज हो गए। इजरायल पर दर्जनों मिसाइल बैराज – हैफा के ऑयल रिफाइनरी हिट, तेल अवीव के रिहायशी इलाकों में क्लस्टर मुनिशंस गिरे, सेंट्रल इजरायल में ट्रेन स्टेशन प्रभावित। ईरान ने गल्फ के अमेरिकी बेस और पड़ोसी देशों की एनर्जी साइट्स पर धमकी दी। ऑयल प्राइस आसमान छू गए, ग्लोबल मार्केट्स में हलचल मच गई। UN ने चेतावनी दी कि अगर युद्ध नहीं रुका तो वैश्विक त्रासदी हो सकती है।
अब मुख्य सवाल – अगर ईरान सैन्य रूप से पूरी तरह हार भी जाए, रिजीम बदल जाए, कोई नया लीडर सत्ता संभाल ले, तब भी क्या ईरान को हारा माना जाएगा? नहीं। क्योंकि किसी भी युद्ध का असली फैसला सैन्य जीत-हार या क्षेत्रीय कब्जे से नहीं होता। फैसला होता है मूल उद्देश्य से। अगर कोई देश अपना मुख्य मकसद हासिल कर लेता है, तो वो जीत गया। ईरान ने यही कर दिखाया – वो भी युद्ध शुरू होने से पहले ही।
ईरान का मूल संदेश क्या रहा है?
“हमें भी जीने दो, तुम भी जियो।” ईरान कभी किसी की गुलामी नहीं करता। वो अफगानिस्तान, इराक, सऊदी अरब, बहरीन, दुबई की तरह अपने देश पर अमेरिकी अड्डे नहीं बनाता। पिछले 20-25 सालों में अमेरिका ने तेल-गैस की लालच में खाड़ी के ज्यादातर मुस्लिम देशों में पैर जमा लिए। लेकिन ईरान अकेला ऐसा देश रहा जहां अमेरिका का पूरा नियंत्रण नहीं चल पाया। ईरान ने कभी अमेरिका की शर्तें पूरी तरह नहीं मानीं – न परमाणु डील में झुका, न इजरायल के हमलों पर चुप रहा।
फिलिस्तीन का मुद्दा सबसे बड़ा कारण रहा। ईरान ने इजरायल के हमलों का विरोध किया। ये विरोध यहूदी-मुस्लिम दुश्मनी पर आधारित नहीं था, बल्कि गाजा में मासूम बच्चों और महिलाओं के कत्लेआम पर था। ईरान ने हिजबुल्लाह को सपोर्ट किया, हसन नसरल्लाह जैसे लीडर्स का साथ दिया। कासिम सुलेमानी की शहादत के बाद भी ईरान नहीं रुका। इजरायल को ये बात चुभी, अमेरिका को बहाना मिल गया। परमाणु कार्यक्रम के नाम पर सालों से आर्थिक नाकेबंदी, सैंक्शंस – लेकिन ईरान ने साफ कहा कि बातचीत हमारी शर्तों पर होगी।
खामेनेई की हत्या के बाद क्या हुआ?
ईरान का सिस्टम नहीं टूटा। असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स ने जल्दी से मोजताबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर चुना। पॉलिसी में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। ईरान ने जवाबी हमले जारी रखे – इजरायल पर मिसाइलें, गल्फ एनर्जी साइट्स पर थ्रेट। अमेरिका और इजरायल के बीच भी मतभेद दिख रहे हैं – US इंटेलिजेंस चीफ ने कहा कि दोनों के लक्ष्य अलग हैं। नेतन्याहू रिजीम चेंज चाहते हैं, जबकि ट्रंप ने कहा कि गैस फील्ड पर हमले नहीं जारी रहेंगे।
ईरान की जीत के मुख्य आधार:
फिलिस्तीन का साथ और इजरायल की एकतरफा कार्रवाई का विरोध – ईरान ने दुनिया को दिखाया कि वो अकेला खड़ा होकर मासूमों के लिए लड़ सकता है। प्रॉक्सी ग्रुप्स जैसे हिजबुल्लाह और हूती आज भी सक्रिय हैं।
अमेरिका का खाड़ी में दखल रोकना – ईरान ने साबित किया कि सुपरपावर भी हर जगह कंट्रोल नहीं कर सकती। साउथ पार्स जैसे साइट्स पर हमले के बावजूद ईरान ने ग्लोबल ऑयल मार्केट को हिला दिया।
संप्रभुता और सम्मान की रक्षा – छोटे देश होने के बावजूद ईरान ने सुपरपावर को आंख दिखाई। लीडर की हत्या के बाद भी रिजीम खड़ा रहा, जवाब दिया। ये जिद ही सबसे बड़ी जीत है।
युद्ध में नुकसान दोनों तरफ भारी है। हजारों मौतें, अर्थव्यवस्था चरमरा रही है, ऑयल प्राइस 100-150 डॉलर के पार। लेकिन ईरान आज भी अपनी बात पर कायम है। अगर अमेरिका-इजरायल अपनी शर्तों पर झुका लेते, तो हार मान ली जाती। लेकिन ईरान ने अपनी शर्तों पर खड़े रहकर इतिहास रच दिया।
दुनिया की सुपरपावर से टकराने वाला ईरान आज भी अटल है। जंग का अंत जो भी हो – सत्ता पलट जाए या नहीं – लेकिन ईरान ने अपना उद्देश्य हासिल कर लिया। ये जीत इतिहास में दर्ज होगी – एक मुल्क की अटूट इच्छाशक्ति की जीत।



