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आज़म ख़ान को 2 साल की सज़ा: क्या कानून सबके लिए बराबर है?
ज़की भारतीय ✍🏼
लखनऊ,16 मई। रामपुर की एमपी/एमएलए कोर्ट ने समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता वा पूर्व मंत्री मोहम्मद आज़म ख़ान को 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान दिए गए एक बयान के मामले में 2 साल की सज़ा और 5,000 रुपये जुर्माने की सज़ा सुनाई है। उनपर आरोप था कि उन्होंने चुनावी सभा में तत्कालीन डीएम को “तनखैया” कहते हुए यह बयान दिया था कि “इन कलेक्टर-प्लेक्टर से मत डरना, इन्हीं से बहन जी के जूते साफ़ करवाए जाएंगे।” अदालत ने इसे आपत्तिजनक मानते हुए दोषसिद्धि की। लेकिन सवाल सिर्फ़ इतना नहीं है कि आज़म ख़ान ने क्या कहा था। बड़ा सवाल यह है कि क्या देश में कानून और न्याय की कसौटी हर नेता, हर दल और हर समुदाय के लिए एक जैसी है? भारतीय राजनीति का इतिहास ऐसे बयानों से भरा पड़ा है जिनमें नेताओं ने डीएम, एसपी अधिकारियों, पत्रकारों, न्यायपालिका और यहाँ तक कि पूरे समुदायों तक पर अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं। कई मामलों में एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई, कहीं हुई तो कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी, और कहीं अदालतों की सख़्त टिप्पणियों के बावजूद केस ठंडे बस्ते में डाल दिए गए। इसी क्रम में हरियाणा के एक मुख्यमंत्री द्वारा कर्नल सोफिया कुरैशी को लेकर दिए गए विवादित बयान पर भी देशभर में बहस छिड़ी थी। बयान के बाद विरोध हुआ, एफआईआर दर्ज हुई और हाई कोर्ट ने राज्य के डीजीपी से जवाब तलब करते हुए कार्रवाई पर सवाल उठाए। लेकिन समय बीतने के साथ मामला धीमा पड़ गया। इसी तरह कई नेताओं द्वारा खुले मंचों से नफ़रत फैलाने वाले भाषण दिए गए, जिन पर सुप्रीम कोर्ट तक ने चिंता जताई और राज्यों को स्वतः संज्ञान लेने तक की बात कही, मगर ज़मीनी स्तर पर बहुत कम मामलों में सज़ा तक बात पहुँचती दिखाई दी है।

इसके उलट आज़म ख़ान का राजनीतिक और कानूनी सफ़र देखिए
वे 10 बार विधायक, 2 बार सांसद और उत्तर प्रदेश सरकार में कई बार मंत्री रह चुके हैं। उनके ऊपर दर्ज मामलों की संख्या इतनी बढ़ी कि एक समय ऐसा लगा मानो हर घटना में उनका नाम जोड़ देना ही राजनीतिक व्यवस्था का सामान्य तरीका बन गया हो। कभी भाषण, कभी किताब चोरी, कभी बकरी चोरी, कभी सफ़ाई मशीन चोरी, यहाँ तक कि शराब के ठेके के गल्ले से लूट जैसे आरोप भी लगाए गए। देश की संसद में बैठे अनेक जनप्रतिनिधियों पर हत्या, दंगा, बलात्कार और गंभीर आपराधिक धाराओं के मुक़दमे लंबित हैं। एडीआर की रिपोर्टें लगातार यह बताती रही हैं कि संसद और विधानसभाओं में बड़ी संख्या ऐसे जनप्रतिनिधियों की है जिन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। लेकिन उन मामलों की सुनवाई वर्षों तक लटकी रहती है। कई लोग मंत्री भी बनते हैं और सत्ता का हिस्सा भी रहते हैं। ऐसे माहौल में आज़म ख़ान के खिलाफ़ तेज़ी से हुई कार्रवाइयाँ एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक प्रश्न खड़ा करती हैं। क्या यह सिर्फ़ कानून का पालन है, या फिर कानून का चयनात्मक इस्तेमाल? आलोचक कहते हैं कि आज़म ख़ान का राजनीतिक व्यक्तित्व हमेशा टकराव वाला रहा, उनकी भाषा भी कई बार विवादित रही। यह बात अपनी जगह सही हो सकती है। लेकिन लोकतंत्र में न्याय का सिद्धांत व्यक्ति नहीं, सिद्धांत के आधार पर तय होना चाहिए। अगर एक नेता के बयान पर 2 साल की सज़ा हो सकती है, तो वही पैमाना उन नेताओं पर क्यों नहीं लागू होता जो खुले मंचों से समुदाय विशेष के खिलाफ़ विवादित या नफ़रत भरे बयान देते हैं? यह भी सच है कि आज़म ख़ान ने शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा सपना देखा था। जौहर यूनिवर्सिटी सिर्फ़ एक संस्थान नहीं बल्कि पिछड़े और गरीब तबकों के लिए शिक्षा का सपना बताई जाती रही। लेकिन आज वही यूनिवर्सिटी लगातार कानूनी और राजनीतिक विवादों के केंद्र में है। देश में कानून का सम्मान तभी मज़बूत होगा जब जनता को यह महसूस होगा कि न्याय सत्ता, धर्म, जाति और राजनीतिक दल देखकर नहीं किया जाता।

वरना हर फैसला सिर्फ़ कानूनी नहीं, राजनीतिक नज़र आने लगता है। आज मुद्दा सिर्फ़ आज़म ख़ान नहीं हैं। मुद्दा यह है कि क्या भारत में कानून की धार एक जैसी चलती है, या फिर कुछ लोगों के लिए तलवार और कुछ के लिए सिर्फ़ कागज़ी चेतावनी बनकर रह जाती है।
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