HomeArticleगांधी, आरएसएस और मुस्लिम लीग: क्या हिंदू राष्ट्र की साजिश थी बंटवारा?

गांधी, आरएसएस और मुस्लिम लीग: क्या हिंदू राष्ट्र की साजिश थी बंटवारा?

ज़की भारतीय

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 वर्ष पूरे होने पर संगठन ने इसे राष्ट्र निर्माण का उत्सव बताया, लेकिन इसके इतिहास में कई सवाल अनुत्तरित हैं। विशेष रूप से, आरएसएस का मुस्लिम लीग के साथ गठजोड़ और महात्मा गांधी के प्रति उसका विरोध एक गंभीर प्रश्न उठाता है।
क्या आरएसएस ने भारत के बंटवारे को बढ़ावा दिया ताकि हिंदू राष्ट्र का सपना साकार हो? साथ ही, गांधीजी पर आरोप कि उन्होंने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देकर बंटवारे को समर्थन दिया, क्या यह सही है? या यह एक ऐसी साजिश थी जिसमें गांधीजी को बलि का बकरा बनाया गया?
इस लेख में हम इन सवालों का तथ्यपरक विश्लेषण करेंगे और देखेंगे कि क्या गांधीजी का अहिंसक स्वतंत्रता आंदोलन ही भारत को एकजुट रखने का कारण था, जबकि आरएसएस की नीतियां विभाजनकारी थीं।

आरएसएस और मुस्लिम लीग का गठजोड़ – हिंदुओं का विरोध क्यों?

आरएसएस और हिंदू महासभा ने 1940 के दशक में मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन किया, खासकर सिंध, बंगाल और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) में। क्रिस्टोफ जाफरलॉट की किताब The Hindu Nationalist Movement and Indian Politics: 1925 to the 1990s (1996, पेंगुइन बुक्स, पृष्ठ 89-92) में लिखा है कि 1942 में हिंदू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन सरकारें बनाईं, जब भारत छोड़ो आंदोलन अपने चरम पर था।

यह गठजोड़ ब्रिटिश शासन को मजबूत करने और स्वतंत्रता आंदोलन को कमजोर करने का प्रयास था। शम्सुल इस्लाम की Indian Freedom Movement and RSS: A Story of Betrayal (2006, पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, पृष्ठ 67-70) में इसका विस्तृत विवरण है कि विनायक दामोदर सावरकर ने 1942 में कहा: “मुस्लिम लीग के साथ समझौता हिंदुओं के हित में है।”
लेकिन आज आरएसएस समर्थक उन दलों, जैसे कांग्रेस या समाजवादी पार्टी, पर “मुस्लिम तुष्टिकरण” का आरोप लगाते हैं जो मुस्लिम समुदाय के हित की बात करते हैं। यह दोहरा मापदंड क्यों? अगर मुस्लिम लीग के साथ गठजोड़ जायज था, तो अन्य दलों की नीतियों पर आपत्ति क्यों?

ए.जी. नूरानी की The RSS and the BJP: A Division of Labour (2000, लेफ्टवर्ड बुक्स, पृष्ठ 115-118) में लिखा है कि आरएसएस ने मुस्लिम लीग के साथ गठजोड़ को “रणनीतिक” बताया, लेकिन इसका उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम विभाजन को गहराना था। यह हिंदू राष्ट्र के सपने को साकार करने की दिशा में एक कदम था, जिसमें मुस्लिम आबादी को भारत से बाहर करना शामिल था।

महात्मा गांधी पर आरोप है कि उन्होंने 1947 में पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने का समर्थन किया, जिससे बंटवारा मजबूत हुआ। यह आरोप आरएसएस और उसके समर्थकों द्वारा बार-बार दोहराया जाता है। लेकिन तथ्य क्या कहते हैं,1947 में भारत और पाकिस्तान के बीच संपत्ति बंटवारे के तहत, भारत को पाकिस्तान को 75 करोड़ रुपये देने थे।
भारत ने पहले 20 करोड़ रुपये दिए, लेकिन शेष 55 करोड़ रुपये रोक दिए क्योंकि पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला किया था। गांधीजी ने 1948 में अनशन शुरू किया, जिसमें उनकी मांग थी कि भारत अपनी प्रतिबद्धता पूरी करे और 55 करोड़ रुपये दे। रामचंद्र गुहा की किताब India After Gandhi (2007, पेंगुइन, पृष्ठ 78-80) में लिखा है कि गांधीजी का मानना था कि यह धन देना नैतिक जिम्मेदारी है, क्योंकि बंटवारा दोनों पक्षों की सहमति से हुआ था।

गांधीजी ने कहा: “पैसा रोकना विश्वासघात होगा।”

गांधीजी के अनशन के बाद भारत ने 55 करोड़ रुपये दिए। लेकिन यह बंटवारे को मजबूत करने के लिए नहीं, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय साख बनाए रखने के लिए था। लॉर्ड माउंटबेटन ने भी गांधीजी के इस कदम की प्रशंसा की (माउंटबेटन पेपर्स, 1948, नेशनल आर्काइव्स ऑफ इंडिया)।

आरएसएस समर्थक इसे “मुस्लिम तुष्टिकरण” कहते हैं, लेकिन गांधीजी का उद्देश्य भारत को एक नैतिक और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में स्थापित करना था। अगर गांधीजी ने यह राशि देने से मना किया होता, तो भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता और हिंसा और बढ़ सकती थी।

बंटवारा क्यों हुआ?

बंटवारा मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा और ब्रिटिश नीतियों का परिणाम था। जाफरलॉट (1996, पृष्ठ 100) लिखते हैं कि आरएसएस और हिंदू महासभा ने “दो-राष्ट्र सिद्धांत” को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन दिया, क्योंकि यह उनके हिंदू राष्ट्र के सपने को मजबूत करता था। गांधीजी ने बंटवारे को रोकने की हर कोशिश की, लेकिन जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल ने इसे “अपरिहार्य” माना (गुहा, पृष्ठ 65)।

नाथूराम गोडसे और गांधीजी का विरोध

आरएसएस और उसके समर्थक नाथूराम गोडसे को “देशभक्त” मानते हैं, क्योंकि उन्होंने गांधीजी की हत्या (30 जनवरी 1948) को की। गोडसे हिंदू महासभा और आरएसएस के सदस्य थे, हालांकि आरएसएस ने बाद में इससे इनकार किया।

लेकिन तथ्य क्या हैं?

गोडसे का बयान: गोडसे ने अपनी किताब Why I Assassinated Mahatma Gandhi (1949, पृष्ठ 45-50) में लिखा कि गांधीजी की “मुस्लिम तुष्टिकरण” नीतियां हिंदुओं के खिलाफ थीं। वह 55 करोड़ रुपये के भुगतान को हिंदुओं का अपमान मानता था।

आरएसएस का रुख

गोलवलकर ने गांधीजी की हत्या की निंदा की, लेकिन आरएसएस के प्रकाशनों (Organizer, 1948) में गांधीजी को बार-बार “मुस्लिम समर्थक” कहा गया। नूरानी (2000, पृष्ठ 130) लिखते हैं कि आरएसएस ने गोडसे को कभी पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया, और आज उनके समर्थक गोडसे को “हीरो” बनाते हैं।

गांधीजी की विरासत

गांधीजी ने अहिंसक आंदोलन चलाकर ब्रिटिश शासन को मजबूर किया। उनके नमक सत्याग्रह (1930), भारत छोड़ो आंदोलन (1942) और दांडी मार्च ने विश्व में भारत को एक नैतिक शक्ति बनाया। बिपिन चंद्रा की India’s Struggle for Independence (1989, पेंगुइन, पृष्ठ 400-420) में लिखा है कि गांधीजी की रणनीति ने ब्रिटिश साम्राज्य को घुटनों पर ला दिया।

गांधीजी का सम्मान, आरएसएस की नीतियों की समीक्षा

अगर नहीं होता बंटवारा, तो 50 करोड़ से ऊपर होती भारत में मुस्लिम आबादी 

महात्मा गांधी भारत के राष्ट्रपिता हैं, जिन्होंने अहिंसा और एकता के बल पर स्वतंत्रता दिलाई। उनके 55 करोड़ रुपये के निर्णय को गलत समझना एक साजिश का हिस्सा है, जिसे आरएसएस और हिंदू महासभा ने बढ़ावा दिया। दूसरी ओर, आरएसएस का मुस्लिम लीग के साथ गठजोड़ और बंटवारे को अप्रत्यक्ष समर्थन हिंदू राष्ट्र के सपने का हिस्सा था। अगर बंटवारा नहीं होता, तो भारत में 50-60 करोड़ मुस्लिम आबादी के साथ एक मजबूत धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बन सकता था। लेकिन आरएसएस की नीतियों ने हिंदू-मुस्लिम विभाजन को गहराया, जो आज भी नफरत की राजनीति के रूप में दिखता है।
गांधीजी का सम्मान करना हर भारतीय का कर्तव्य है, क्योंकि उनकी अहिंसा ने भारत को स्वतंत्र कराया। आरएसएस की नीतियों की समीक्षा होनी चाहिए, क्योंकि उनकी ब्रिटिश समर्थक और विभाजनकारी रणनीतियों ने देश को कमजोर किया। हमें संविधान और एकता की रक्षा करनी होगी, न कि नफरत को बढ़ावा देना।

जय हिंद, जय भारत!

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