HomeArticleएक नज़र बिहार के आगमी विधानसभा चुनाव पर

एक नज़र बिहार के आगमी विधानसभा चुनाव पर

ज़की भारतीय

लखनऊ,3 जून। बिहार में इस साल अक्टूबर-नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव देश की सियासत के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकते हैं। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले और उसके जवाब में 6-7 मई को शुरू किए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने देश में एक नया सियासी माहौल बनाया है। इस हमले में 26 लोगों की मौत और सांप्रदायिक आधार पर हत्याओं ने देश में तनाव पैदा किया, जिसके बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को नष्ट करने के लिए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ चलाया। भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस ऑपरेशन को राष्ट्रीय सुरक्षा और हिंदुत्व के प्रतीक के रूप में पेश कर रहे हैं, लेकिन बिहार में इसका कितना असर होगा, यह एक जटिल सवाल है। नीतीश कुमार की अगुवाई वाली एनडीए सरकार और विपक्षी महागठबंधन, खासकर राहुल गांधी की कांग्रेस, इस माहौल में अपनी-अपनी रणनीतियों के साथ मैदान में हैं। बेरोजगारी, सांप्रदायिकता, और परिवर्तन की मांग जैसे मुद्दे इस चुनाव को और जटिल बना रहे हैं।

ऑपरेशन सिंदूर और BJP का नैरेटिव

BJP ऑपरेशन सिंदूर को बिहार चुनाव में एक प्रमुख मुद्दा बनाने की कोशिश में है। पार्टी ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ कठोर कार्रवाई के रूप में प्रचारित किया है। X पर BJP की पोस्ट्स में दावा किया गया कि “पाकिस्तान में घुसकर आतंकी ठिकानों को खंडहर में बदल दिया गया” और “प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार की धरती पर आतंकियों को मिट्टी में मिलाने का वादा पूरा किया।” हालांकि, कई राजनीतिक विश्लेषकों और जनता का एक वर्ग इसे सैन्य शहादत का राजनीतिकरण मानता है। X पर कुछ यूजर्स ने लिखा कि “जनता समझ रही है कि BJP सैनिकों की शहादत को वोट के लिए इस्तेमाल कर रही है।” ऑपरेशन सिंदूर के बाद अमेरिका की मध्यस्थता में सीजफायर की स्थिति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कई लोग मानते हैं कि पाकिस्तान के खिलाफ और सख्त कार्रवाई होनी चाहिए थी, जैसे आतंकियों को प्रत्यर्पण की मांग या मजबूत शर्तों पर सीजफायर। इस कमी ने BJP की छवि को कुछ हद तक प्रभावित किया है, खासकर उन हिंदू वोटरों में जो सेकुलर सोच रखते हैं और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से तंग आ चुके हैं।

नीतीश कुमार की चुनौतियां और मुस्लिम वोटों की नाराजगी

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जनता दल (यूनाइटेड) के लिए यह चुनाव आसान नहीं है। नीतीश ने हाल ही में स्वर्ण आयोग का गठन कर सवर्ण समाज की नाराजगी को कम करने की कोशिश की है, लेकिन मुस्लिम वोटरों में उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। इसका प्रमुख कारण है नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और वक्फ बोर्ड बिल जैसे मुद्दों पर उनकी खामोशी। बिहार की 19.6% मुस्लिम आबादी में से 56% से अधिक ने 2024 के लोकसभा चुनावों में महागठबंधन को वोट दिया था, जबकि केवल 28.47% ने NDA को समर्थन दिया। नीतीश की गठबंधन राजनीति और बार-बार पक्ष बदलने की छवि ने उनकी विश्वसनीयता को और कमजोर किया है। विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम वोटों का रुझान इस बार तेजस्वी यादव और राहुल गांधी की जोड़ी की ओर हो सकता है, जो जातिगत जनगणना और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को जोर-शोर से उठा रहे हैं।

हिंदू वोटरों में नाराजगी और ‘सिंदूर’ का विवाद

BJP और नरेंद्र मोदी ने ऑपरेशन सिंदूर को “पाकिस्तान में बैठकर हमारी बहनों का सिंदूर उजाड़ने वालों” के खिलाफ कार्रवाई के रूप में पेश किया है। लेकिन इस नैरेटिव ने हिंदू समुदाय के एक बड़े वर्ग, खासकर महिलाओं और सेकुलर हिंदुओं, को नाराज कर दिया है। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इसे “संवेदनशील प्रतीक का राजनीतिक दुरुपयोग” बताया। X पर एक यूजर ने लिखा, “महिलाओं के सिंदूर को युद्ध के नाम से जोड़ना अपमानजनक है।” यह नाराजगी उन शहरी और शिक्षित हिंदू वोटरों में ज्यादा है, जो हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण से ऊब चुके हैं और बेरोजगारी, शिक्षा, और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर ध्यान चाहते हैं। बिहार में 48.23% अनुसूचित जाति (SC) वोटरों ने 2024 में NDA को समर्थन दिया था, लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद हिंदुत्व के अतिरेक से इनमें से कुछ वोटरों का झुकाव बदल सकता है।

राहुल गांधी और कांग्रेस की रणनीति

कांग्रेस, राहुल गांधी के नेतृत्व में, बिहार में अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए आक्रामक रणनीति अपना रही है। राहुल गांधी ने हाल ही में बिहार में कई दौरे किए, जिनमें दरभंगा में दलित छात्रों से संवाद और भोपाल में ‘संगठन सृजन अभियान’ शामिल हैं। उनकी रणनीति दलित, मुस्लिम, और सवर्ण वोटरों को साधने पर केंद्रित है। राहुल ने जातिगत जनगणना को प्रमुख मुद्दा बनाया है, जिसे नीतीश कुमार ने पहले बिहार में लागू किया था। कांग्रेस का दावा है कि नीतीश की खामोशी और BJP के साथ गठबंधन ने सामाजिक न्याय के उनके दावे को कमजोर किया है। X पर कांग्रेस ने BJP पर ऑपरेशन सिंदूर के जरिए सेना का अपमान करने का आरोप लगाया, जिससे वह सेकुलर और मध्यमार्गी वोटरों को लुभाने की कोशिश कर रही है।

सपा और अन्य दलों की भूमिका

समाजवादी पार्टी (SP) और बहुजन समाज पार्टी (BSP) जैसे क्षेत्रीय दल भी बिहार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। SP, जो महागठबंधन का हिस्सा है, यादव और मुस्लिम वोटरों को साधने की कोशिश कर रही है। तेजस्वी यादव के ‘मुस्लिम+यादव’ (MY) समीकरण को नीतीश के ‘लव-कुश’ और महिला वोट बैंक से चुनौती मिल रही है। BSP, जो पिछले कुछ चुनावों में कमजोर रही है, दलित वोटों को बांट सकती है, जिसका फायदा NDA को मिल सकता है। हालांकि, मायावती की BSP इस बार कितनी प्रभावी होगी, यह स्पष्ट नहीं है।

बेरोजगारी और परिवर्तन की मांग

बिहार में बेरोजगारी और आर्थिक विकास सबसे बड़े मुद्दे बने हुए हैं। शिक्षित युवा और शहरी मध्यम वर्ग हिंदू-मुस्लिम सियासत से तंग आ चुके हैं और रोजगार, शिक्षा, और स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार चाहते हैं। X पर कई यूजर्स ने लिखा कि “ऑपरेशन सिंदूर से पेट नहीं भरेगा, नौकरी चाहिए।” राहुल गांधी और तेजस्वी यादव इन मुद्दों को उठाकर युवा और सेकुलर वोटरों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर, नीतीश कुमार ने बिहार में औषधि भंडार केंद्र और सरकारी कर्मचारियों के DA में वृद्धि जैसे कदम उठाए हैं, लेकिन उनकी गठबंधन बदलने की छवि और BJP के साथ समझौता उनकी राह में बाधा बन सकता है।

सियासी समीकरण और भविष्य

2024 के लोकसभा चुनावों में BJP को बिहार में केवल 12 सीटें मिली थीं, जबकि JDU ने 12 और RJD ने 4 सीटें जीती थीं। इस बार विधानसभा चुनाव में BJP और JDU का गठबंधन ऑपरेशन सिंदूर, हिंदुत्व, और विकास के मुद्दों पर लड़ेगा, लेकिन मुस्लिम और सेकुलर हिंदू वोटरों की नाराजगी इसे कमजोर कर सकती है। राहुल गांधी और तेजस्वी यादव की जोड़ी सामाजिक न्याय, जातिगत जनगणना, और बेरोजगारी जैसे मुद्दों को उठाकर महागठबंधन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि कांग्रेस और RJD एकजुट रहते हैं, तो वे नीतीश की विश्वसनीयता और BJP के ध्रुवीकरण पर सवाल उठाकर बाजी मार सकते हैं।बिहार का यह चुनाव न केवल राज्य की सत्ता तय करेगा, बल्कि 2024 के बाद केंद्र में कमजोर हुई BJP की स्थिति पर भी असर डालेगा। क्या ऑपरेशन सिंदूर BJP के लिए ‘सिंदूर कार्ड’ साबित होगा, या बेरोजगारी और परिवर्तन की मांग कांग्रेस को वापसी का मौका देगी? यह सवाल बिहार की जनता के मूड पर निर्भर करता है, जो इस बार बदलाव की ओर इशारा कर रहा है।

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