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वक्फ संशोधन बिल पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई,संभावित रोक, और न्यायपालिका की ताकत

ज़की भारतीय

लखनऊ, 16 मई । वक्फ संशोधन बिल 2024 को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही कानूनी जंग अब और तेज होने वाली है। इस बिल के खिलाफ दायर याचिकाओं पर अगली सुनवाई 20 मई 2025 को होने की संभावना है, यह मामला न केवल वक्फ बोर्ड की शक्तियों और संपत्तियों के प्रबंधन से जुड़ा है, बल्कि संवैधानिक अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता, और न्यायपालिका की स्वायत्तता जैसे बड़े सवालों को भी छूता है।

सुनवाई की तारीख और संदर्भ

सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ संशोधन बिल पर पिछली सुनवाई 15 मई 2025 तक टाल दी थी, और अब चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की अगुवाई वाली बेंच ने इसे 20 मई 2025 तक के लिए स्थगित किया है। इस सुनवाई में बिल के कुछ प्रावधानों की संवैधानिकता पर सवाल उठाए गए हैं, जिसमें गैर-मुस्लिम सदस्यों को वक्फ बोर्ड में शामिल करने, ‘वक्फ बाय यूजर’ संपत्तियों की स्थिति, और सरकारी भूखंडों पर वक्फ की दावेदारी जैसे मुद्दे शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं, जिनमें AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद शामिल हैं, का दावा है कि यह बिल मुस्लिम समुदाय के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।

क्या लग सकती है रोक?

सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक बिल के किसी भी हिस्से पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार किया है। हालांकि, याचिकाकर्ताओं की दलीलें, खासकर वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल द्वारा उठाए गए बिंदु, जैसे धार्मिक मामलों में सरकारी दखल और गैर-मुस्लिमों को वक्फ बोर्ड में शामिल करने की वैधता, कोर्ट का ध्यान खींच रही हैं। लीगल एक्सपर्ट्स का मानना है कि कोर्ट कुछ विवादास्पद प्रावधानों, जैसे वक्फ संपत्तियों को डिनोटिफाई करने की प्रक्रिया या गैर-मुस्लिम सदस्यों की बहुलता, पर अंतरिम रोक लगा सकता है, बशर्ते याचिकाकर्ता संविधान के अनुच्छेद 13 के तहत मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का ठोस सबूत पेश करें। फिर भी, कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह इस मामले में जल्दबाजी में फैसला नहीं लेगा और सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद ही कोई आदेश पारित करेगा।

विपक्षी नेताओं और कुछ सोशल मीडिया पोस्ट्स में दावा किया गया है कि केंद्र सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पर दबाव डाल रही है। हालांकि, ऐसी कोई ठोस जानकारी सामने नहीं आई है जो इस दावे की पुष्टि करे। सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में कई मामलों में अपनी स्वतंत्रता का परिचय दिया है, जैसे यूपी में बुलडोजर कार्रवाई को असंवैधानिक ठहराना और दृष्टिबाधित उम्मीदवारों को न्यायिक सेवाओं में शामिल करने का ऐतिहासिक फैसला। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अनुच्छेद 142 को “न्यूक्लियर मिसाइल” कहकर न्यायपालिका की शक्ति पर सवाल उठाए थे, लेकिन कोर्ट ने इसे लोकतांत्रिक शक्तियों के खिलाफ नहीं, बल्कि पूर्ण न्याय के लिए जरूरी बताया।

सुप्रीम कोर्ट के अधिकार और न्यायपालिका की ताकत

सुप्रीम कोर्ट भारत के संविधान का संरक्षक है और इसके पास व्यापक अधिकार हैं। अनुच्छेद 142 के तहत, कोर्ट को पूर्ण न्याय करने का विशेष अधिकार प्राप्त है, जिसे हाल के फैसलों में बार-बार देखा गया है। अनुच्छेद 13 के तहत, कोर्ट किसी भी कानून को रद्द कर सकता है जो मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता हो। इसके अलावा, अनुच्छेद 145(3) के तहत संवैधानिक मामलों की सुनवाई कम से कम पांच जजों की बेंच द्वारा की जाती है, जो इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है।सुप्रीम कोर्ट ने हाल के फैसलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निष्पक्ष सुनवाई, और समावेशी न्याय जैसे मुद्दों पर जोर दिया है, जिससे यह साफ है कि वह न केवल कानून की व्याख्या करता है, बल्कि संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने में भी अग्रणी भूमिका निभाता है। वक्फ संशोधन बिल पर सुनवाई में भी कोर्ट से उम्मीद है कि वह निष्पक्षता और संवैधानिकता के आधार पर फैसला लेगा, चाहे सरकारी पक्ष कितना भी मजबूत हो।

20 मई 2025 की सुनवाई में केंद्र सरकार को अपना रुख और स्पष्ट करना होगा। अगर कोर्ट को लगता है कि बिल के कुछ हिस्से संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करते हैं, तो वह उन पर रोक लगा सकता है या पूरे बिल को रद्द करने पर विचार कर सकता है। यह मामला न केवल वक्फ बोर्ड के भविष्य को प्रभावित करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि क्या भारत की शीर्ष अदालत दबाव में झुकती है या फिर यह दिखाती है कि न्यायपालिका का मतलब क्या होता है।

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