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लखनऊ के ऐतिहासिक हुसैनगंज चौराहे के नाम बदलने पर सवाल

ज़की भारतीय

लखनऊ, 12 मई । उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने लखनऊ के ऐतिहासिक हुसैनगंज चौराहे का नाम बदलकर ‘महाराणा प्रताप चौराहा’ कर दिया है। 9 मई 2025 को महाराणा प्रताप जयंती के अवसर पर मुख्यमंत्री ने इस चौराहे पर महाराणा प्रताप की स्वर्ण प्रतिमा का सौंदर्यीकरण कर लोकार्पण किया। सरकार का दावा है कि यह कदम सांस्कृतिक गौरव को पुनर्स्थापित करता है और मुगल व नवाबी काल में बदले गए हिंदू नामों को वापस लाता है। लेकिन क्या हुसैनगंज का नाम वाकई किसी हिंदू देवी-देवता या हिंदू व्यक्तित्व से बदलकर रखा गया था? और क्या पुराने नामों को बदलना उचित है, जबकि ब्रिटिश शासन के अत्याचारों से जुड़े नाम आज भी बने हुए हैं? यह खबर ऐतिहासिक तथ्यों, नवाबी विरासत, और नामकरण की नीति पर सवाल उठाती है।

हुसैनगंज का ऐतिहासिक नाम: कोई हिंदू संदर्भ नहीं

हुसैनगंज चौराहा अवध के नवाबी शासन (1722-1856) से जुड़ा है। इसका नाम संभवतः नवाब अमजद अली शाह (1842-1847) से प्रेरित है, जिन्हें उनके उपनाम ‘हजरत’ के कारण ‘हुसैन’ से जोड़ा जाता है। ऐतिहासिक स्रोत, जैसे अब्दुल हलीम शरर की ‘गुलिस्ता-ए-लखनऊ’, नेविल्स गजेटियर ऑफ लखनऊ (1904), और लखनऊ जिला प्रशासन के रिकॉर्ड (lucknow.nic.in), में कोई उल्लेख नहीं है कि हुसैनगंज पहले किसी हिंदू देवी-देवता (जैसे लक्ष्मी, सरस्वती) या हिंदू नाम (जैसे लक्ष्मण चौराहा) से जाना जाता था। लखनऊ को प्राचीन काल में लक्ष्मणपुर या लखनपुरी कहा जाता था, जो भगवान राम के भाई लक्ष्मण से जुड़ा है, लेकिन यह नाम पूरे शहर के लिए था, न कि किसी विशिष्ट चौराहे के लिए। नवाबी काल में लक्ष्मण टीला जैसे हिंदू नाम बने रहे, जो नवाबों की सांस्कृतिक समन्वय नीति को दर्शाता है।नवाबों ने लखनऊ को एक आधुनिक शहर बनाया, जिसमें हुसैनगंज, सआदतगंज, और हजरतगंज जैसे नए क्षेत्र विकसित किए। ये नाम उनकी सांस्कृतिक पहचान से जुड़े थे, न कि किसी हिंदू नाम को हटाकर रखे गए। योगी सरकार का सामान्य दावा कि नवाबों ने हिंदू नाम बदले, हुसैनगंज के लिए लागू नहीं होता। कोई ऐतिहासिक स्रोत इस बात की पुष्टि नहीं करता कि हुसैनगंज का नाम किसी हिंदू संदर्भ को मिटाकर रखा गया। 1857 के विद्रोह में कई अभिलेख नष्ट होने से कुछ जानकारी अनुपलब्ध है, लेकिन मौजूदा रिकॉर्ड इस दावे का समर्थन नहीं करते।

महाराणा प्रताप का सम्मान, लेकिन लखनऊ से संबंध?

महाराणा प्रताप (1540-1597) मेवाड़ के वीर शासक थे, जिन्होंने मुगल सम्राट अकबर के खिलाफ हल्दीघाटी युद्ध (1576) में अदम्य साहस दिखाया। उनकी कुर्बानियाँ और स्वतंत्रता की भावना भारतीय इतिहास में स्वर्णिम हैं। लेकिन उनका लखनऊ या अवध से कोई प्रत्यक्ष ऐतिहासिक संबंध नहीं था। आम तौर पर, शहरों में चौराहों के नाम स्थानीय नायकों, स्वतंत्रता सेनानियों, या शहर से जुड़े व्यक्तियों के नाम पर रखे जाते हैं। उदाहरण के लिए, लखनऊ में वीरांगना उदादेवी चौराहा (पूर्व में सिकंदरबाग) 1857 के विद्रोह की नायिका के नाम पर है, जो स्थानीय इतिहास से जुड़ा है।हुसैनगंज का नाम बदलकर महाराणा प्रताप के नाम पर रखना उनके बलिदान को सम्मान देता है, लेकिन यह पुरानी नवाबी विरासत को मिटाने का प्रयास भी प्रतीत होता है। नवाबों ने लखनऊ में सांस्कृतिक समृद्धि को बढ़ाया। नवाब वाजिद अली शाह ने कथक, ठुमरी, और रासलीला को संरक्षण दिया। बेगम हजरत महल ने 1857 में हिंदू-मुस्लिम एकता के साथ ब्रिटिशों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। हुसैनगंज जैसे नाम इस सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक हैं। इन्हें बदलना एक समुदाय की ऐतिहासिक पहचान को कमजोर करता है।

नवाबी शासन: अत्याचार नहीं, समन्वय

योगी सरकार का तर्क कि नवाबों ने हिंदू नाम बदले और अत्याचार किए, ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाता। अवध के नवाबों ने हिंदुओं पर व्यवस्थित अत्याचार का कोई रिकॉर्ड नहीं है। उन्होंने हिंदू मंदिरों, जैसे लक्ष्मण टीला, को संरक्षण दिया। नवाबी शासन में हिंदू जमींदारों को प्रशासन में शामिल किया गया।

नवाब आसफ-उद-दौला ने बड़े मंगल का आयोजन शुरू किया

नवाब आसफ-उद-दौला ने बड़े मंगल का आयोजन शुरू किया, जो आज भी लखनऊ में हनुमान जयंती के रूप में मनाया जाता है। हुसैनाबाद ट्रस्ट में हिंदू कर्मचारियों के लिए वजीफे की व्यवस्था थी। इतिहासकार रवि भट्ट के अनुसार, नवाबी शासन में हिंदू-मुस्लिम समन्वय की नीति थी, और जातिवाद या धार्मिक भेदभाव का कोई प्रमाण नहीं है।
इसके विपरीत, ब्रिटिश शासन (1757-1947) ने भारत में आर्थिक शोषण, सांस्कृतिक दमन, और क्रूरता की। बंगाल अकाल (1770), जजिया जैसे कर, और क्रांतिकारियों (जैसे भगत सिंह) की फाँसी ब्रिटिश अत्याचारों के उदाहरण हैं। लाखों भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में वीरगति को प्राप्त हुए। फिर भी, लखनऊ में किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज (KGMC) और रेजीडेंसी जैसे ब्रिटिश नाम आज भी बने हैं। KGMC को अटल बिहारी वाजपेयी या किसी भारतीय नायक के नाम पर करने का प्रस्ताव 2017 में आया, लेकिन लागू नहीं हुआ, क्योंकि इसका अंतरराष्ट्रीय महत्व और प्रशासनिक रिकॉर्ड प्रभावित हो सकते हैं।

ब्रिटिश नामों पर बनी इमारतों और शहरों के नाम कब बदलेंगे सरकार?

लखनऊ में KGMC, और देशभर में कोलकाता (पूर्व में कलकत्ता), मुंबई (पूर्व में बॉम्बे), और शिमला जैसे नाम ब्रिटिश शासन की देन हैं। ये नाम औपनिवेशिक अत्याचारों की याद दिलाते हैं। ब्रिटिशों ने भारत को लूटा, स्थानीय शिक्षा को कमजोर किया, और स्वतंत्रता सेनानियों को जेल में डाला। फिर भी, इन नामों को बदलने पर कम ध्यान दिया गया। इसका कारण व्यावहारिकता और राजनीतिक प्राथमिकता है। मुस्लिम नाम (जैसे हुसैनगंज, इलाहाबाद) बदलना हिंदूवादी समर्थकों को अपील करता है, जबकि अंग्रेजी नाम ‘तटस्थ’ माने जाते हैं और सांप्रदायिक विवाद नहीं पैदा करते। लेकिन यह दोहरा मापदंड सवाल उठाता है: यदि नवाबी नाम बदले जा सकते हैं, तो ब्रिटिश नाम क्यों नहीं?पुराने नाम बदलना: अनुचित और विवादास्पदपुराने नाम बदलना, जैसे हुसैनगंज को महाराणा प्रताप चौराहा करना, ऐतिहासिक विरासत को नुकसान पहुँचाता है। लखनऊ की नवाबी संस्कृति ने शहर को वैश्विक पहचान दी। हुसैनगंज जैसे नाम इस सांस्कृतिक समन्वय का हिस्सा हैं। इन्हें बदलना एक समुदाय की पहचान को कमजोर करता है और सांप्रदायिक तनाव बढ़ाता है।

मायावती ने अंबेडकर पार्क तो अखिलेश ने लोहिया पार्क बनवाया

समाजवादी पार्टी ने लखनऊ में लोहिया पार्क बनवाया और उसका नाम डॉ. राम मनोहर लोहिया के नाम पर रखा, जो उचित था, क्योंकि यह नया निर्माण था। मायावती ने अंबेडकर पार्क और हाथी पार्क बनवाए, जिनके नाम बाबासाहेब अंबेडकर से जोड़े गए। यह भी स्वीकार्य था, क्योंकि ये नए प्रोजेक्ट थे। लेकिन पुराने नाम, जैसे हुसैनगंज या सिकंदरबाग, बदलना ठीक वैसा है जैसे कोई विदेशी उत्पाद पर ‘मेड इन इंडिया’ की मोहर लगाकर उसे अपना आविष्कार बता दे। यह ऐतिहासिक सत्य को तोड़-मरोड़ता है।लखनऊ में गोमती नगर, विकासखंड, और शहीद पथ जैसे नए क्षेत्र विकसित हुए हैं। सरकार इनके चौराहों और सड़कों के नाम स्वतंत्रता सेनानियों या स्थानीय नायकों, जैसे बेगम हजरत महल, उदादेवी, या अटल बिहारी वाजपेयी, के नाम पर रख सकती है। लेकिन पुराने नाम बदलना अनुचित है। सिकंदरबाग को वीरांगना उदादेवी चौराहा करना स्थानीय इतिहास से जुड़ा था, लेकिन हुसैनगंज का नाम बदलना केवल सांस्कृतिक ध्रुवीकरण को बढ़ाता है।

दीर्घकालिक प्रभाव: अंतहीन नामकरण का सिलसिला

पुराने नाम बदलने की नीति सांप्रदायिक तनाव को बढ़ाएगी। यदि भविष्य में कोई दूसरी सरकार सत्ता में आती है, तो वह महाराणा प्रताप चौराहे को फिर से हुसैनगंज कर सकती है। यह अंतहीन सिलसिला ऐतिहासिक स्थिरता को नुकसान पहुँचाएगा और संसाधनों का दुरुपयोग करेगा। सरकार को नए निर्माणों पर ध्यान देना चाहिए, जैसे अयोध्या में राम मंदिर परिसर के चौराहे, जिनके नाम हिंदू प्रतीकों पर रखे जा सकते हैं।नामकरण की यह नीति दोहरे मापदंड को उजागर करती है। नवाबी नामों को अत्याचार से जोड़ा जाता है, जबकि ब्रिटिश नामों को ‘ऐतिहासिक महत्व’ के नाम पर छोड़ दिया जाता है। यदि सांस्कृतिक गौरव प्राथमिकता है, तो KGMC को अटल बिहारी वाजपेयी मेडिकल कॉलेज, और कोलकाता को काली माता नगर क्यों नहीं किया जाता? यह नीति न केवल इतिहास को तोड़-मरोड़ती है, बल्कि सामाजिक एकता को भी कमजोर करती है।

 

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