लखनऊ, 11 मई । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज सुबह 9:15 बजे लखनऊ में अपने सरकारी आवास पर सूचना विभाग के अधिकारियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य प्रदेश में सूचना प्रसारण व्यवस्था को और मजबूत करना और सरकार की योजनाओं को जनता तक प्रभावी ढंग से पहुँचाना था। बैठक में प्रमुख सचिव, मुख्यमंत्री कार्यालय सूचना निदेशक और अन्य वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे।
सीएम योगी ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि सरकार की उपलब्धियों और जनकल्याणकारी योजनाओं को हर गांव और शहर तक पहुँचाया जाए। उन्होंने कहा, “सूचना विभाग सरकार और जनता के बीच सेतु का काम करता है। यह सुनिश्चित करें कि हर योजना की जानकारी पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से लोगों तक पहुँचे।” उन्होंने डिजिटल और सोशल मीडिया के उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि गलत सूचनाओं का तुरंत खंडन किया जाए। योगी ने विशेष रूप से रक्षा क्षेत्र की उपलब्धियों, जैसे ब्रह्मोस यूनिट उद्घाटन, को व्यापक प्रचार करने के निर्देश दिए।बैठक में मुख्य सचिव मनोज कुमार सिंह ने भी हिस्सा लिया, जिन्होंने सूचना विभाग की कार्यप्रणाली पर सुझाव दिए। विशाल सिंह ने विभाग की नई पहलों, जैसे डिजिटल कैंपेन और जनसंपर्क अभियानों, के बारे में जानकारी दी। सीएम ने अधिकारियों को चेतावनी दी कि किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा, “जनता का भरोसा जीतना हमारी प्राथमिकता है, और इसके लिए सूचना तंत्र को और चुस्त करना होगा।”इस बैठक में भारत-पाकिस्तान तनाव के बीच ऑपरेशन सिंदूर की सफलता को प्रचारित करने पर भी चर्चा हुई। योगी ने कहा कि उत्तर प्रदेश की जनता को यह जानना चाहिए कि उनकी सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा में कैसे योगदान दे रही है। यह बैठक सूचना विभाग के लिए एक रोडमैप तैयार करने में महत्वपूर्ण रही, जो सरकार की नीतियों को और प्रभावी ढंग से जनता तक ले जाएगा।
सूचना विभाग को इस मंच का उठाना चाहिए लाभ, कई धड़ों में बँट गई है पत्रकारिता
उत्तर प्रदेश सरकार का सूचना विभाग लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर समाचार पत्रों, न्यूज़ एजेंसियों, और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से अपनी उपलब्धियों को जनता तक पहुँचाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन आम जनता तक इनका प्रभाव सीमित है। इसका प्रमुख कारण सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव है, जो सत्यता का एक शक्तिशाली मंच बन चुका है। लोग सच को पसंद करते हैं, लेकिन इसी मंच पर झूठ और भ्रामक खबरें भी फैल रही हैं। ऐसे में सरकार को अपनी योजनाओं को जन-जन तक पहुँचाने के लिए महंगे विज्ञापनों से परहेज कर यूट्यूब चैनल्स और डिजिटल पोर्टल्स जैसे मुफ्त और सुलभ माध्यमों पर ध्यान देना होगा।आम जनता, जो गरीबी और आर्थिक तंगी से जूझ रही है, के पास 5 रुपये का अखबार या 300-500 रुपये मासिक न्यूज़ चैनल्स का खर्च वहन करने की क्षमता नहीं है। सरकारी नौकरियों की कमी, समय की कमी, और शिक्षा के कारण लोग पारंपरिक मीडिया से दूरी बना रहे हैं।
मुख्यमंत्री जी एक नज़र इधर भी
गोदी मीडिया, जो सरकार की अंधी चापलूसी करता है, और कुछ स्वतंत्र पत्रकार, जो केवल सरकार की आलोचना पर केंद्रित हैं। दोनों ही संतुलन की कमी से जूझ रहे हैं। पत्रकारिता को दर्पण होना चाहिए, जो सरकार के सराहनीय कदमों की तारीफ करे और कमियों को उजागर करे, ताकि सुधार हो सके।सोशल मीडिया पर एक तीसरा रूप उभरा है, जो संतुलित दृष्टिकोण रखता है—सरकार की अच्छी नीतियों की सराहना करता है और जनविरोधी नीतियों की आलोचना करता है।
सरकार को यूट्यूब चैनल्स और पोर्टल्स रजिस्टर करने चाहिए, जिन्हें 30,000 दैनिक व्यूअर्स पर विज्ञापन दिए जाएँ, न कि केवल 5 लाख व्यूअर्स वाली शर्त पर। इससे छोटे चैनल्स भी सरकार की योजनाओं को जनता तक पहुँचाएँगे। वर्तमान में, केवल विवादास्पद या सरकार-विरोधी खबरें ही लाखों व्यूज पाती हैं, जबकि सरकारी उपलब्धियों के वीडियो को कम दर्शक मिलते हैं।सूचना विभाग को चाहिए कि वह डिजिटल कैंपेन शुरू करे, जिसमें छोटे और स्थानीय चैनल्स को प्रोत्साहन दिया जाए। यह न केवल लागत प्रभावी होगा, बल्कि आम जनता तक योजनाओं की जानकारी पहुँचेगी। सरकार को इस दिशा में तुरंत कदम उठाने चाहिए।
महंगे समाचार पत्रों (जैसे 5 लाख रुपये का फुल-पेज विज्ञापन) और इलेक्ट्रॉनिक चैनलों के बजाय यूट्यूब चैनल्स और डिजिटल पोर्टल्स पर कम लागत वाले विज्ञापन दिए जाएँ। अखबार एक बार पढ़े जाने के बाद रद्दी में चले जाते हैं, और इलेक्ट्रॉनिक चैनलों की खबरें दोबारा आसानी से नहीं देखी जातीं। इसके विपरीत, यूट्यूब और पोर्टल्स पर खबरें और विज्ञापन बार-बार देखे जा सकते हैं। कोई भी व्यक्ति सर्च कर इन चैनल्स तक पहुँच सकता है, और विज्ञापन लगातार दर्शकों तक पहुँचते रहते हैं।सूचना विभाग को छोटे चैनल्स और पोर्टल्स को प्रोत्साहित करना चाहिए, जिन्हें कम लागत पर विज्ञापन दिए जाएँ। यह न केवल सरकारी योजनाओं को मुफ्त में जनता तक पहुँचाएगा, बल्कि इन चैनल्स की कमाई का रास्ता भी खोलेगा। इससे उनकी रोजी-रोटी चलेगी, और वे सरकार की योजनाओं को प्रभावी ढंग से प्रचारित करेंगे। वर्तमान में, केवल विवादास्पद या सरकार-विरोधी खबरें लाखों व्यूज पाती हैं, जबकि सरकारी उपलब्धियों को कम दर्शक मिलते हैं। कम लागत वाले विज्ञापनों से छोटे चैनल्स को प्रोत्साहन मिलेगा, और सरकार की योजनाएँ दूर-दराज तक पहुँचेंगी। सूचना विभाग को इस दिशा में तुरंत कदम उठाने चाहिए, ताकि जनता को योजनाओं का लाभ मिले।



