HomeArticleसत्य का दर्पण और पत्रकारिता की गिरती हुई साख

सत्य का दर्पण और पत्रकारिता की गिरती हुई साख

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ज़की भारतीय

पत्रकारिता को समाज का आईना माना जाता है। कवि अपनी शायरी में, लेखक अपनी लेखनी में, और सच्चे पत्रकार अपनी खबरों में सत्य को उजागर करते हैं। यह मार्ग कांटों भरा है, क्योंकि सत्य सुनने की आदत न हुकूमत को है, न ही उन ताकतवर लोगों को, जो सच से डरते हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब कलम चला, उसने तलवार का काम किया; जब-जब जुबान बोली, उसने अत्याचारियों के सीने पर गोलियों सा प्रहार किया। सच्चा पत्रकार वही है, जिसकी कलम और जुबान न तो किसी की गुलाम हो, न ही बिकाऊ। लेकिन आज उत्तर प्रदेश सहित देशभर में दलाली और ब्लैकमेलिंग ने पत्रकारिता को बदनाम कर दिया है।

दलाल पत्रकारों द्वारा रिश्वतखोरी और ब्लैकमेलिंग का धंधा

आज के दौर में, जब इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया की बाढ़ आई है, पत्रकारिता का स्वरूप बदल गया है। सच्चे पत्रकार समाज के लिए दर्पण का काम करते हैं, लेकिन कुछ तथाकथित पत्रकार, जिन्हें ‘दलाल पत्रकार’ कहना उचित है, इस पेशे को कलंकित कर रहे हैं। ये लोग न तो शिक्षित हैं, न ही पत्रकारिता के मूल्यों को समझते हैं। आठवीं पास भी नहीं, फिर भी तेजतर्रार व्यवहार और चापलूसी के दम पर ये प्रशासनिक अधिकारियों के करीब पहुंच जाते हैं। उत्तर प्रदेश, खासकर लखनऊ सहित पूरे राज्य में, ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां पत्रकारों पर रिश्वतखोरी, दलाली, और ब्लैकमेलिंग के आरोप लगे, मुकदमे दर्ज हुए, और कई जेल गए। ये लोग फोटो खिंचवाकर, अधिकारियों के साथ वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपनी ‘पहुंच’ का ढोंग रचते हैं। इनका पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं; ये सिर्फ रिश्वतखोरी और ब्लैकमेलिंग के धंधे में लिप्त हैं।

पत्रकारिता: व्यापार नहीं, जिम्मेदारी

पत्रकारिता कोई व्यापार नहीं कि उससे कमाई शुरू कर दी जाए। सच्ची पत्रकारिता में मेहनत और ईमानदारी की जरूरत होती है, लेकिन आज के दौर में जायज कमाई मुश्किल है। समाचार पत्र और चैनल चलाने के लिए धन चाहिए, जो अक्सर विज्ञापनों और डीएवीपी (Directorate of Advertising and Visual Publicity) से मिलता है। लेकिन विज्ञापन तभी मिलते हैं, जब समाचार पत्र या चैनल सरकार और प्रशासन की चापलूसी में लीन हो। जो समाचार पत्र सरकार के खिलाफ एक शब्द भी नहीं लिखते हैं, उन्हें ही विज्ञापन का लाभ मिलता है। चाहे वो मौजूदा सरकार हो या पूर्व की सरकारें रही हों।
नतीजतन, कई समाचार संस्थान समझौता कर लेते हैं और वही लिखते हैं, जो प्रशासनिक अधिकारियों को पसंद हो। यही वजह है कि आज ‘गोदी मीडिया’ का तमगा लगाया जा रहा है। दूसरी ओर, जो खुद को ‘सेकुलर मीडिया’ कहते हैं, उनमें भी कई बार दलाली की छाया दिखती है। बड़े पैमाने पर प्रसार वाले समाचार पत्र हों या छोटे, कई बार वे भी सत्ता की खामियों पर पर्दा डालकर कमाई करते हैं।

उत्तर प्रदेश में रिश्वतखोरी और ब्लैकमेलिंग के मामले

उत्तर प्रदेश में दलाल पत्रकारों की करतूतें कोई नई बात नहीं हैं। कई मामले सामने आए हैं, जहां पत्रकारों पर रिश्वतखोरी और ब्लैकमेलिंग के आरोप में मुकदमे दर्ज हुए और कुछ को जेल की सजा भी मिली।

असीम रजा जैदी (संभल, 2024): संभल हिंसा के बाद एक तथाकथित पत्रकार असीम रजा जैदी को पुलिस ने गिरफ्तार किया। उन पर आरोप था कि वे क्यूआर कोड के जरिए हिंसा में मारे गए लोगों के परिवारों की मदद के नाम पर पैसे वसूल रहे थे और पुलिस-प्रशासन के खिलाफ लोगों को भड़का रहे थे।

बलिया में रंगदारी का मामला

(2023): बलिया जिले में एक स्थानीय पत्रकार पर एक वकील को जान से मारने की धमकी देकर रंगदारी मांगने का आरोप लगा। पुलिस ने इस मामले में मुकदमा दर्ज किया।

लखनऊ में कुछ पत्रकारों पर स्थानीय व्यापारियों और अधिकारियों से पैसे ऐंठने के आरोप लगे। सोशल मीडिया पर चर्चा है कि कई पत्रकार फर्जी खबरें छापकर या खबर दबाने की धमकी देकर वसूली करते हैं।ब्लैकमेलिंग और पत्रकारों की हत्याएं
कुछ पत्रकारों ने पत्रकारिता को ब्लैकमेलिंग का हथियार बना लिया है। ये लोग किसी व्यक्ति की निजी कमियां, जैसे अवैध रिश्ते या संवेदनशील जानकारी, उजागर करने की धमकी देकर पैसे मांगते हैं। यदि पीड़ित पक्ष पैसा नहीं देता, तो ये पत्रकार खबर को दबाए रखते हैं या दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। ऐसे मामलों में कई बार ब्लैकमेलिंग के चलते पत्रकारों की हत्याएं हुईं।

2017-2022 के बीच 12 पत्रकारों की हत्या

उत्तर प्रदेश में 2017 से 2022 के बीच 12 पत्रकारों की हत्या हुई, जिनमें कुछ मामले ब्लैकमेलिंग से जुड़े हो सकते हैं।

राकेश सिंह ‘निर्भीक’ (बलरामपुर, 2020)

राकेश को उनके घर में आग लगाकर मार डाला गया। वे भ्रष्टाचार के खिलाफ लिखते थे, लेकिन कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि उनकी हत्या स्थानीय दबंगों से विवाद के कारण हुई, जिसमें ब्लैकमेलिंग का पहलू भी हो सकता है।

शुभम मणि त्रिपाठी (उन्नाव, 2020)

रेत माफिया के खिलाफ लिखने वाले शुभम की गोली मारकर हत्या की गई। उनकी हत्या के पीछे माफिया से पैसे की मांग या धमकी जैसे कारण भी चर्चा में रहे।

विक्रम जोशी (गाजियाबाद, 2020)

विक्रम को दिनदहाड़े गोली मारी गई। उनकी हत्या निजी विवाद और ब्लैकमेलिंग से जुड़ी बताई गई।यदि ये पत्रकार सच लिखते और ब्लैकमेलिंग की बजाय सत्य को उजागर करते, तो शायद उनकी हत्याएं न होतीं। कोई भी व्यक्ति अपनी इज्जत पर आंच नहीं चाहता, और जब पत्रकार उनकी कमियों को पैसे के लिए दबाते हैं, तो हिंसक प्रतिक्रिया हो सकती है। सच्चाई लिखने से समाज का भला होता है, जबकि ब्लैकमेलिंग से सिर्फ खतरे बढ़ते हैं।

सच्चे पत्रकारों पर फर्जी मुकदमों का दबाव

सच्चे पत्रकार, जो भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ लिखते हैं, उन पर फर्जी मुकदमे दर्ज कर उनकी आवाज दबाने की कोशिश की जाती है। उत्तर प्रदेश में ऐसे कई उदाहरण हैं।

ममता त्रिपाठी (2024)

सुप्रीम कोर्ट ने ममता त्रिपाठी को अंतरिम संरक्षण प्रदान किया, जिन पर उत्तर प्रदेश प्रशासन में जातिगत भेदभाव का आरोप लगाने वाले लेख के लिए चार एफआईआर दर्ज की गई थीं।

अभिषेक उपाध्याय (2024)

अभिषेक ने भी जातिगत गतिशीलता पर लेख लिखा, जिसके लिए उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई।धर्मेंद्र मिश्रा (सुलतानपुर): महिलाओं के खिलाफ अपराध की सच्चाई लिखने पर उन पर 2500 रुपये की लूट का फर्जी मुकदमा दर्ज किया गया।

अजीत सिंह सैनी (लखीमपुर खीरी)

भ्रष्टाचार के खिलाफ खबर छापने के कारण पुलिस ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया।

सिद्धार्थ वरदराजन (रामपुर, 2021)

‘द वायर’ के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन के खिलाफ किसान रैली में एक किसान की मौत को लेकर ट्वीट करने पर एफआईआर दर्ज की गई।पिछले डेढ़ साल में उत्तर प्रदेश में कम से कम 15 पत्रकारों के खिलाफ खबर लिखने के मामलों में मुकदमे दर्ज किए गए हैं। 2017 से 2022 के बीच पत्रकारों पर हमले के 138 मामले दर्ज किए गए, जिनमें 50 से अधिक शारीरिक हमले शामिल हैं।

दलाली का काला सच: साधारण से शान तक

कई ऐसे लोग हैं, जो कभी 300-600 रुपये की नौकरी करते थे या दुकानों पर काम करके गुजारा करते थे। लेकिन पत्रकारिता के नाम पर दलाली शुरू करने के बाद आज वे फॉर्च्यूनर गाड़ियों में घूमते हैं और बड़े-बड़े मकानों के मालिक बन चुके हैं। यह दलाली का काला सच है, जो पत्रकारिता को बदनाम कर रहा है। इनके पास न तो पत्रकारिता की शिक्षा है, न ही नैतिकता। ये सिर्फ सत्ता और पैसे की चापलूसी में लीन हैं।

सच्चाई की ताकत: रवीश कुमार जैसे पत्रकार

इतिहास गवाह है कि सत्य हमेशा सर चढ़कर बोलता है। रवीश कुमार जैसे पत्रकार, जो सच्चाई के लिए जाने जाते हैं, आज भी लोगों की जुबान पर हैं। उनकी पत्रकारिता ने समाज में बदलाव की मिसाल कायम की है। सच्चाई लिखने का मजा और उसका प्रभाव झूठी खबरों या दलाली में कभी नहीं हो सकता। सच्चे पत्रकारों के नाम इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखे जाते हैं, जबकि दलाल पत्रकारों का कोई भविष्य नहीं।
सत्य की जीत, दलाली की हार
उत्तर प्रदेश में दलाल पत्रकारों की रिश्वतखोरी, ब्लैकमेलिंग, और सत्ता के साथ सांठगांठ चिंता का विषय है। ये लोग पत्रकारिता को धंधा बनाकर समाज और पेशे को बदनाम कर रहे हैं। सच्चे पत्रकारों पर दबाव और फर्जी मुकदमे लोकतंत्र के लिए खतरा हैं। ब्लैकमेलिंग के चलते कुछ पत्रकारों की हत्याएं इस बात का सबूत हैं कि गलत रास्ता कितना खतरनाक हो सकता है। सत्य लिखने वाले पत्रकारों का सम्मान आज भी है। आइए, सच्चाई को बढ़ावा दें, दलाल पत्रकारों का बहिष्कार करें, और पत्रकारिता की साख को बचाएं।

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