डाक्टर आमना रिज़वी
लखनऊ, 10 अक्टूबर । समाजवादी पार्टी (सपा) के वरिष्ठ नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री अजम खान की जेल से रिहाई ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में हलचल मचा दी है। हालांकि आज़म खान की रिहाई 23 सितंबर 2025 को ही हो चुकी है, लेकिन उनके बयानों और अटकलों ने आज भी चर्चा का विषय बना रखा है।
योगी आदित्यनाथ सरकार के शासनकाल में इतनी आसानी से रिहा होना अपने आप में संशय पैदा करता है। क्या यह सपा के लिए राहत है या बसपा की ओर मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की रणनीति का हिस्सा
आइए, इसकी पड़ताल करें।
रिहाई की पृष्ठभूमि और संशयास्पद पहलू
आज़म खान को 23 महीने की कैद के बाद सीतापुर जेल से रिहा किया गया। यह रिहाई भूमि हड़पने के मामले सहित 72 मामलों में जमानत मिलने के बाद संभव हुई।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में डुंगरपुर विध्वंस मामले में भी उन्हें जमानत दी, जिसमें उन्हें 10 साल की सजा सुनाई गई थी।
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इसे न्याय की जीत बताते हुए कहा कि बीजेपी ने झूठे मुकदमों से उन्हें फंसाया था। लेकिन सवाल यह उठता है कि योगी सरकार के तहत यह रिहाई इतनी सहज कैसे हो गई? विशेषज्ञों का मानना है कि यह बीजेपी की रणनीति हो सकती है, ताकि मुस्लिम वोटों का बंटवारा हो और विपक्ष कमजोर पड़े।
रिहाई के तुरंत बाद आज़म खान ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की प्रमुख मायावती की तारीफ की। उन्होंने कहा, “मायावती एक बड़े समुदाय की नेता हैं, मैं उनकी बहुत इज्जत करता हूं। जब चाहूं, उनसे मिल सकता हूं।” यह बयान साफ इशारा देता है कि रिहाई कुछ शर्तों के साथ हुई हो सकती है। जेल के दौरान सपा ने उनके लिए कोई बड़ा धरना-प्रदर्शन नहीं किया, जिससे आज़म खान नाराज नजर आ रहे हैं। वे मुलायम सिंह यादव के पुराने साथी हैं, लेकिन अखिलेश के नेतृत्व पर सवाल उठा चुके हैं।
बसपा में शामिल होने की अटकलें: दलित-मुस्लिम समीकरण का खेल
अटकलें हैं कि अजम खान सपा छोड़कर बसपा में शामिल हो सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो दलित-मुस्लिम गठजोड़ मजबूत होगा, जो बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। यूपी में मुस्लिम वोटों का बंटवारा सपा-बसपा के बीच होता रहा है। मुलायम सिंह के जमाने में “परिंदा पर नहीं मार सकता” जैसे जुमलों से मुसलमानों को जोड़ा गया, लेकिन जब वोट किसी एक तरफ गए, तो सरकारें बनीं। वहीं, बीजेपी ने मुस्लिम समुदाय को बांटने के लिए कई मुद्दे उछाले—जैसे सीएए-एनआरसी, लव जिहाद—जिससे उनके वोट बिखर गए। परिणामस्वरूप, कई सीटों पर बीजेपी के उम्मीदवार कम वोटों से जीतते नजर आए।
अजम खान का बसपा में जाना सपा को तात्कालिक नुकसान पहुंचा सकता है। हालांकि, अखिलेश के सामने आज़म इतने बड़े नहीं हैं, लेकिन रामपुर-मुरादाबाद बेल्ट में उनके प्रभाव से 5-10% मुस्लिम वोट बसपा की ओर खिसक सकते हैं। कांग्रेस को भी झटका लगेगा, क्योंकि मायावती कांशीराम की पुण्यतिथि (3 अक्टूबर) के बहाने दलित राजनीति को फिर से गरम कर रही हैं। लेकिन समझदार दलित जानते हैं कि मायावती की लंबी खामोशी—जब बीजेपी सरकार में दलितों पर अत्याचार हो रहे थे—उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है।
जेल के दौरान सपा ने आज़म के लिए ज्यादा सक्रियता नहीं दिखाई, जबकि अन्य मामलों में धरने-प्रदर्शन होते रहे। आज़म खुद को सपा का फाउंडर सदस्य मानते हैं और मुलायम के साथ उनके पुराने रिश्ते जगजाहिर हैं। अगर वे सपा से मुंह मोड़ लेते हैं, तो पार्टी का मुस्लिम आधार कमजोर पड़ सकता है। लेकिन आज़म ने रिहाई के बाद कहा, “मैं इलाज कराना चाहता हूं, जेल में किसी से संपर्क नहीं था।” यह बयान साफ करता है कि राजनीतिक फैसला आने वाले दिनों में होगा। फिलहाल, सपा पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ेगा, लेकिन लंबे समय में नुकसान हो सकता है।
वोटों का बंटवारा जारी
अजम खान की रिहाई यूपी की सियासत में वोट बैंक की जंग को तेज कर रही है। बीजेपी को इससे फायदा मिल सकता है, अगर मुस्लिम वोट सपा से बसपा की ओर शिफ्ट होते हैं। मायावती की सक्रियता दलितों को जगाएगी, लेकिन उनकी पुरानी खामोशी पर सवाल बने रहेंगे। आने वाले समय में आज़म का अगला कदम तय करेगा कि विपक्ष कितना मजबूत होगा। क्या यह बीजेपी की मास्टरस्ट्रोक है या सपा के लिए नया संकट? यह वक्त ही बताएगा।



