ज़की भारतीय
लखनऊ,19 जून। ईरान और इजरायल के बीच चल रहा तनाव अब एक नाजुक मोड़ पर पहुंच चुका है, जहां वैश्विक शक्तियों की प्रतिक्रियाएं और क्षेत्रीय समीकरण इस युद्ध को और जटिल बना रहे हैं। हाल की खबरों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनई को दी गई धमकी के बाद ईरान में एक अभूतपूर्व प्रदर्शन देखने को मिला। हजारों ईरानियों ने कफन बांधकर सड़कों पर उतरकर न केवल अपनी एकजुटता दिखाई, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी भी बाहरी दबाव के सामने झुकने को तैयार नहीं हैं। यह प्रदर्शन न केवल ईरान की जनता के हौसले का प्रतीक है, बल्कि शिया संप्रदाय की उस गहरी आस्था को भी दर्शाता है, जो कर्बला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन की शहादत से प्रेरित है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा खामनाई की हत्या किए जाने का जो बयान दिया गया उसको लेकर ईरान में कफन पहनके लोग जमकर प्रदर्शन कर रहे हैं। इसके अलावा अयातुल्लाह इमाम सिस्तानी ने एक गंभीर चेतावनी जारी करते हुए कहा कि “अगर इमाम खामनाई को निशाना बनाया गया तो पूरे क्षेत्र को कल्पना से परे परिणाम भुगतने होंगे।
ये सिर्फ एक चेतावनी नहीं है यह एक लाल रेखा है” अयातुल्लाह इमाम सिस्तानी के इस बयान के बाद यह माना जा सकता है कि अब इराक भी इस जंग में कूदने वाला है।

कफन बांधकर सड़कों पर उतरे ईरानी: हौसले को सलाम
ईरान की राजधानी तेहरान, इस्फहान, मशहद और तबरीज़ जैसे प्रमुख शहरों में लोग कफन पहनकर सड़कों पर उतरे। यह दृश्य न केवल भावनात्मक था, बल्कि यह ईरान की जनता की उस अटल भावना को दर्शाता है, जो किसी भी जुल्म के सामने झुकने से इनकार करती है। सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनई ने अपने बयान में कहा, “शहादत हमारी रूह में है, ज़ुल्म पर चुप्पी नहीं। ईरान आज अकेला है, लेकिन कमजोर नहीं। ज़ख्मी है, मगर झुका नहीं।” यह बयान शिया संप्रदाय की उस आस्था को रेखांकित करता है, जो मानता है कि “कुल्लो नफ्सिन ज़ाइकतुल मौत” (हर प्राणी को मौत का स्वाद चखना है)। ईरानी जनता का मानना है कि यदि मृत्यु आनी है, तो वह ऐसी हो जो अमरता प्रदान करे, जैसी कर्बला में इमाम हुसैन की थी।
कर्बला की घटना शिया मुसलमानों के लिए एक प्रेरणा स्रोत रही है, जहां हजरत इमाम हुसैन ने यज़ीद जैसे अत्याचारी शासक के सामने न झुकने का फैसला किया था। ईरान की जनता और खामेनई का यह रुख उसी सिद्धांत पर आधारित है कि सच कभी झूठ के साथ समझौता नहीं कर सकता। इस प्रदर्शन ने न केवल ईरान की एकता को दर्शाया, बल्कि यह भी संदेश दिया कि वे किसी भी बाहरी दबाव या धमकी के सामने न झुकेंगे और न ही कोई समझौता करेंगे।
रूस और वैश्विक प्रतिक्रियाएं

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने हाल ही में बयान दिया कि ईरान ने अभी तक उनसे किसी भी तरह की सैन्य या अन्य सहायता नहीं मांगी है। पुतिन ने कहा, “हम देख रहे हैं कि ईरान इस युद्ध में कहां तक अपनी ताकत दिखा सकता है। अगर जरूरत पड़ी, तो हम मध्यस्थता के लिए तैयार हैं, लेकिन ईरान ने अभी तक कोई मदद नहीं मांगी।” यह बयान इस बात का संकेत है कि ईरान अपनी स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता पर गर्व करता है।
दूसरी ओर, चीन ने भी ईरान के प्रति समर्थन जताया है। चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने ईरानी विदेश मंत्री सईद अब्बास अराघची से बातचीत में तेहरान के “वैध अधिकारों और हितों” की रक्षा का वादा किया। हालांकि, शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के बयान से भारत ने खुद को अलग कर लिया, जो इस क्षेत्र में भारत की तटस्थ नीति को दर्शाता है।
अमेरिका और इजरायल का रुख
अमेरिका ने इस युद्ध में इजरायल का खुलकर समर्थन किया है। डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इजरायल के हमले ईरान को परमाणु समझौते के लिए मजबूर कर सकते हैं। हालांकि, अमेरिकी जनता का एक बड़ा वर्ग इस नीति से असहमत है। सूत्रों के अनुसार, लगभग 85% अमेरिकी नागरिक इस युद्ध में शामिल होने के खिलाफ हैं और ट्रंप के इस रुख की आलोचना कर रहे हैं। यह असंतोष इस बात का संकेत है कि अमेरिका की जनता अब युद्धों से थक चुकी है और वह शांति की पक्षधर है।
इजरायल ने “ऑपरेशन राइजिंग लॉयन” के तहत ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हमले किए, जिसमें कई उच्च रैंकिंग सैन्य कमांडर और वैज्ञानिक मारे गए। जवाब में, ईरान ने “ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 3” के तहत तेल अवीव पर मिसाइल हमले किए, जिससे भारी तबाही हुई। इजरायल का आयरन डोम डिफेंस सिस्टम ईरान की हाइपरसोनिक मिसाइलों को रोकने में नाकाम रहा।
मुस्लिम देशों का रुख और क्षेत्रीय समीकरण
मुस्लिम देशों ने भी इस युद्ध में अपनी स्थिति स्पष्ट की है। सऊदी अरब, यूएई, कतर, और अन्य देशों ने अमेरिका को अपनी जमीन का उपयोग इजरायल के समर्थन में करने से मना कर दिया है। यह एक महत्वपूर्ण कदम है, जो इस क्षेत्र में अमेरिका की स्थिति को कमजोर करता है। रूस और चीन जैसे देशों ने भी ईरान के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद की है, जबकि भारत, जापान और यूरोपीय संघ जैसे देश संयम बरतने की अपील कर रहे हैं।
ईरान की नीति स्पष्ट है: वह किसी भी बाहरी शक्ति के सामने झुकने को तैयार नहीं है। खामेनई ने अपने बयान में कहा, “जब हमने अल्लाह के सामने सजदा कर लिया, तो किसी जालिम के सामने सिर नहीं झुकाएंगे।” यह बयान न केवल शिया संप्रदाय की आस्था को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि ईरान अपनी स्वतंत्रता और सम्मान को सर्वोपरि मानता है।
शांति का रास्ता: इजरायल के लिए एक अवसर
इस युद्ध का समाधान केवल बातचीत और संयम से संभव है। ईरान ने बार-बार कहा है कि यदि इजरायल फिलिस्तीन में अत्याचार और आतंकवादी गतिविधियां बंद कर दे, तो वह शांति के लिए तैयार है। इजरायल को यह समझना होगा कि युद्ध से केवल तबाही होगी। यदि वह अपनी नीतियों में बदलाव लाए और फिलिस्तीन में हिंसा को रोके, तो शांति की संभावना बढ़ सकती है। लेकिन यदि इजरायल और अमेरिका दबाव और धमकियों के रास्ते पर चलते रहे, तो ईरान का जवाब और भी कड़ा होगा।
ईरान के कफन बांधकर सड़कों पर उतरने वाले लोग न केवल अपने हौसले का परिचय दे रहे हैं, बल्कि यह भी दिखा रहे हैं कि उनकी आस्था और एकता किसी भी बाहरी शक्ति से बड़ी है। शिया संप्रदाय की यह भावना, जो कर्बला की शहादत से प्रेरित है, ईरान को एकजुट और मजबूत बनाती है। दूसरी ओर, अमेरिका में जनता का युद्ध-विरोधी रुख और मुस्लिम देशों का इजरायल-अमेरिका गठबंधन से दूरी बनाना इस युद्ध के वैश्विक प्रभाव को दर्शाता है। रूस और चीन जैसे देशों की तटस्थता और मध्यस्थता की पेशकश इस बात का संकेत है कि यह युद्ध केवल दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ सकता है।
ईरान का यह रुख कि वह किसी से मदद नहीं मांगेगा और न ही किसी के सामने झुकेगा, एक मजबूत संदेश है। यह युद्ध न केवल सैन्य शक्ति का प्रदर्शन है, बल्कि आस्था, साहस और आत्मसम्मान की लड़ाई है। विश्व समुदाय को अब संयम और बातचीत के रास्ते पर चलकर इस तनाव को कम करने की जरूरत है, ताकि मध्य पूर्व में शांति स्थापित हो सके।



