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सलेमपुर हाउस में रानी नुज़हत हसन के चेहल्लुम की मजलिस का हुआ आयोजन
लखनऊ, 26 अक्टूबर । सलेमपुर हाउस, लखनऊ की मशहूर शायरा और इस शाही खानदान की एक अहम शख्सियत, मरहूमा रानी नुजहत हसन उर्फ नासिर फातमा बिन्ते कुंवर सैयद मोहम्मद सिब्तैन साहब के इसाले सबाब के लिए मजलिस ए चेहल्लुम का आज सुबह 11 बजे सलेमपुर हाउस, क़ैसरबाग, लखनऊ में आयोजन हुआ। मजलिस का आग़ाज़ तिलावते ए कलाम ए पाक से हुआ।
तिलावत के बाद मरहूमा के लिए सय्यद सुलेमान हैदर सल्लामऊ और मौलाना सय्यदैन जौरासी साहब ने क़ता तारीख़ पेश किया।। जिसके बाद मशहूर वा मआरूफ सोज़ ख्वान ने अपने मख़्सूस अंदाज़ में सोज़ वा सलाम पेश किए। यहां तक कि निज़ामत के फ़रयाज़ जनाब आलम साहब ने अंजाम दिए।
इसके बाद मारूफ शायर शारिब लखनवी मरहूम के फरजंद शायर ए अहलेबैत जनाब हबीब शारबी ने निजामत की जिम्मेदारी संभाली और नौहा ख्वान शरीक जैदपुर, शुमूम आरफी, ज़की भारती, सज्जाद लखनऊ साहब और ख़ुद हबीब शारबी साहब ने बारगाहे अहलेबैत अ स मे मंज़ूम नज़राना ए अक़ीदत पेश किया।
हबीब शारबी साहब और ज़की भारती साहब ने जहां मरहूमा के लिए दो दो क़ते पेश किए वहीं शायरे अहलेबैत शुमूम आरफी साहब ने मरहूमा के लिए मुकम्मल क़ता ए तारीख सुनाया।

हबीब शारबी…..
थी शायरा हुसैन की, मरने के बाद में।
आए अली गुनाहों के होठों को सिल गए।।
नौहे,सलाम और कसीदों की शक्ल में।
ढेरों मकान खुल्द में नुज़हत को मिल गए।।
नुज़हत की अज़मतो पा करे बात क्या हबीब।
सब जानती है बेटी रिसालत मआब की।।
कल तक जो ख़ुद बिछाती थीं फर्शों ग़में हुसैन।
मजलिस है आज उसके लिए ये सवाब की।।
ज़की भारती……
आले अहमद की थी मद्दाह तो, मरहूमा ने।
अपने अशआर से शब्बीर की नुसरत की है।।
मौत के बाद भी नुज़हत ने इबादत के लिए।
कब्र में चेहरा ए हैदर की ज़ियारत की है।।
जिसे इरफान होता है ज़रा सा बिन्ते मुरसल का।
कनीज़े फातेमा ज़हरा की वो सीरत पा चलती है।।
क़ज़ा के वक्त निकली इसतरह से रूह नुज़हत की।
बदन से जिस तरह एक फूल के खुशबू निकलती है।।
शुमूम आरफी…..
ज़िन्दगी में आप ने तै कर लिया
ख़ुलदे मिदहत का सफ़र नुज़हत हसन
क्यों न हो फिर आप का उनमें शुमार
“जिन का है जन्नत में घर नुज़हत हसन”
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शोअरा ए कराम के बाद दुनिया भर में अपनी अलग शिनाख्त रखने वाले मौलाना अली नासिर सईद अबक़ाती उर्फ आगा रूही साहब के फरजंद मौलाना अब्बास नासिर सईद अबक़ाती ने मजलिस को खिताब किया। उन्होंने जहां मरहूमा की तारीफ की वहीं उन्होंने अहलेबैत अ स की फजीलत बयान की। उन्होंने क़ब्र की मंज़िल से वादियुसलाम और जन्नत तक का ज़िक्र करते हुए विलायत ए हज़रत अली अ स पर रौशनी डाली। उन्होंने आख़िर में पैगंबर मोहम्मद मुस्तफा सअवव की एक लौती बेटे हज़रत फातेमा ज़हरा स अ की फजीलत बयान की। और उनकी शहादत का ज़िक्र किया जिसे सुनकर अक़ीदात मंद आह वा बुका करने लगे। मजलिस के बाद अंजुमन ज़फ़रूल ईमान ने नौहा भी पेश किया।
मरहूमा एक नेक और प्रेरक व्यक्तित्व की मालिका थीं, जिन्होंने अपनी शायरी को सिर्फ अहलेबैत की खिदमत और मौला हुसैन के नौहे वा सलाम के लिए समर्पित किया। उनके अनगिनत नोहे और सलाम आज भी मातमी दस्तों, अंजुमनों और घरों में गूंजते हैं।
रानी नुज़हत हसन सलेंपुर हाउस में अजादारी का एक मरकज थीं। मोहर्रम के दौरान उनका घर मजलिसों और इमामबाड़ों का केंद्र हुआ करता था। उन्होंने हमेशा अजादारी की रस्मों को बरकरार रखा और शायरी को सिर्फ इस पवित्र मक़सद के लिए अपनाया। उन्हें इस बात का यकीन था कि जो लोग अहलेबैत से जुड़ते हैं, चाहे वे जाकिर हों, शायर हों, या मजलिस आयोजित करने वाले, उनकी इज्जत दुनिया में भी होती है और मरने के बाद भी लोग उन्हें याद कर रोते हैं। हजरत अली (अ.स.) का इरशाद है, “ऐसे जियो कि लोग तुमसे मिलने की तमन्ना करें और तुम्हारे मरने के बाद तुम्हें याद कर रोएं।” मरहूमा की जिंदगी भी इसी सिद्धांत पर आधारित थी। उनके रिश्तेदार, दोस्त और चाहने वाले आज उनकी याद में आंसुओं के साथ उनकी मोहब्बत और नेकियों के लिए दुआएं कर रहे हैं। उनकी शायरी और नेक अमल उनकी विरासत का हिस्सा हैं, जो हमेशा जिंदा रहेंगे।
राजा सैयद तकी हसन ( सलेमपुर इस्टेट), उनके बेटों, बेटियों, परिवार और रिश्तेदारों ने सभी मोमिनीन और मोमिनात का मजलिस में शिरकत किए जाने का शुक्रिया अदा किया है।
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