लखनऊ,2 मई। भारत और अमेरिका के बीच एक महत्वपूर्ण रक्षा समझौते ने सुर्खियां बटोरी हैं। अमेरिका ने 1 मई को भारत को 131 मिलियन डॉलर (लगभग 1100 करोड़ रुपये) की समुद्री निगरानी तकनीक और उपकरण बेचने की डील को मंजूरी दी। इस समझौते के तहत भारत को अत्याधुनिक सीविजन सॉफ्टवेयर, सैटेलाइट सर्विलांस सर्विसेज, और संबंधित सपोर्ट सर्विसेज मिलेंगी। यह डील इंडो-पैसिफिक मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस (IPMDA) प्रोग्राम का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को बढ़ाना है।सीविजन सॉफ्टवेयर एक अत्याधुनिक तकनीक है, जो सैटेलाइट, रडार, AIS ट्रांसपोंडर्स, और इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर से डेटा एकत्र कर समुद्री गतिविधियों की रीयल-टाइम निगरानी करता है। यह सिस्टम जहाजों को ट्रैक करने, अवैध गतिविधियों जैसे तस्करी और अवैध मछली पकड़ने का पता लगाने, और सैन्य खतरों की पहचान करने में सक्षम है। भारत, जिसकी 7500 किलोमीटर लंबी तटरेखा है, इस तकनीक से हिंद महासागर में अपनी निगरानी क्षमता को अभूतपूर्व स्तर पर ले जाएगा। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों के मद्देनजर यह डील भारत की सामरिक स्थिति को सशक्त बनाएगी। चीन ने हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ाई है, जिसे भारत और उसके क्वाड सहयोगी (अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) एक चुनौती के रूप में देखते हैं। इस समझौते का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह भारत के स्वदेशी रक्षा तकनीक विकास को भी प्रोत्साहित करेगा। डील में शामिल प्रशिक्षण और रिमोट एनालिटिक सपोर्ट भारत के रक्षा वैज्ञानिकों को इस तकनीक को समझने और इसे स्वदेशी सिस्टम में एकीकृत करने में मदद करेगा। डील के तहत अमेरिका भारत के साथ डेटा साझा करेगा, जिससे भारतीय नौसेना और तटरक्षक बल मालाबार स्ट्रेट जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में निगरानी को मजबूत कर सकेंगे।यह डील भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग का एक और उदाहरण है। इससे पहले भारत ने अमेरिका से MQ-9B प्रीडेटर ड्रोन खरीदे थे, और अब यह सॉफ्टवेयर डील क्वाड के MAITRI (Maritime Initiative for Training in the Indo-Pacific) पहल को भी मजबूती देगी, जिसका पहला वर्कशॉप भारत 2025 में आयोजित करेगा। यह समझौता न केवल भारत की समुद्री सुरक्षा को बढ़ाएगा, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता में भी योगदान देगा।



