लखनऊ, 6 जून । उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में गंगा दशहरा और विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आयोजित भव्य वृक्षारोपण कार्यक्रम की चमक उस समय फीकी पड़ गई, जब यह खुलासा हुआ कि शहर के विभिन्न हिस्सों में लगाए गए सैकड़ों पौधे रातोंरात गायब हो गए। यह घटना न केवल पर्यावरण संरक्षण के लिए एक गंभीर चुनौती है, बल्कि नगर निगम की कार्यप्रणाली और अधिकारियों की जवाबदेही पर भी सवाल उठाती है। इस मामले ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की महत्वाकांक्षी पर्यावरणीय पहल ‘एक पेड़ माँ के नाम’ को गहरा आघात पहुँचाया है, जिसे विश्व पर्यावरण दिवस पर जोर-शोर से बढ़ावा दिया गया था।
वृक्षारोपण का भव्य आयोजन और चोरी की घटना
लखनऊ में गंगा दशहरा और विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर नगर निगम और अन्य सरकारी विभागों ने मिलकर शहर के विभिन्न क्षेत्रों—जैसे गोमती तट, हजरतगंज, चारबाग, और आलमबाग—में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वयं अपने लखनऊ आवास पर एक बेल का पौधा रोपा और लोगों से इस अभियान में भाग लेने की अपील की। इस कार्यक्रम में नीम, पीपल, बरगद, और नवरात्रि से संबंधित पौधों को रोपने पर विशेष जोर दिया गया, ताकि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ सांस्कृतिक मूल्यों को भी बढ़ावा मिले।लेकिन, आयोजन के कुछ ही घंटों बाद यह खबर सामने आई कि कई स्थानों से पौधे गायब हो गए। स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने बताया कि जिन स्थानों पर दिन में पौधे रोपे गए थे, वहाँ रात तक केवल गड्ढे बाकी रह गए। गोमती तट के पास लगाए गए 200 से अधिक पौधों में से 70% से ज्यादा गायब पाए गए। इसी तरह, हजरतगंज के पार्कों और सड़क किनारे के क्षेत्रों में भी पौधों के गायब होने की शिकायतें सामने आईं।
नगर निगम पर भ्रष्टाचार के आरोप
इस घटना ने नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। पर्यावरण कार्यकर्ता ने आरोप लगाया, “यह कोई सामान्य चोरी नहीं है। इतने बड़े पैमाने पर पौधों का गायब होना सुनियोजित साजिश का हिस्सा लगता है। नगर निगम के कुछ अधिकारियों की मिलीभगत के बिना यह संभव नहीं है।” उन्होंने माँग की कि इस मामले की उच्चस्तरीय जाँच हो और सीसीटीवी फुटेज का उपयोग कर चोरों का पता लगाया जाए।स्थानीय निवासियों का कहना है कि वृक्षारोपण के लिए जिन ठेकेदारों को जिम्मेदारी दी गई थी, उनकी निगरानी में भारी लापरवाही बरती गई। कुछ लोगों ने यह भी संदेह जताया कि पौधों को जानबूझकर हटाकर कहीं और बेचा गया हो या किसी अन्य प्रोजेक्ट में दोबारा इस्तेमाल किया गया हो। एक स्थानीय दुकानदार, रमेश यादव, ने कहा, “पिछले साल भी ऐसा हुआ था। पौधे लगाए जाते हैं, फोटो खींचे जाते हैं, और फिर रात में सब गायब। यह सब पैसे के खेल का हिस्सा है।
मुख्यमंत्री की पहल पर फेरा जा रहा है पानी
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विश्व पर्यावरण दिवस पर ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान को बढ़ावा देते हुए कहा था, “अगर हर व्यक्ति अपनी माँ के नाम पर एक पेड़ लगाए, तो हम कभी पर्यावरण संकट का सामना नहीं करेंगे।” लेकिन पौधों की चोरी ने उनकी इस पहल पर पानी फेर दिया है। यह घटना उस समय हुई, जब योगी सरकार पर्यावरण संरक्षण और गंगा की स्वच्छता को लेकर बड़े-बड़े दावे कर रही है। पर्यावरणविदों का कहना है कि ऐसी घटनाएँ न केवल सरकारी प्रयासों की विश्वसनीयता को कम करती हैं, बल्कि आम लोगों का भरोसा भी तोड़ती हैं।
चोरी का मकसद और संभावित साजिश
पौधों की चोरी के पीछे कई संभावित मकसद हो सकते हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इन पौधों को नर्सरी में दोबारा बेचने या अन्य सरकारी प्रोजेक्ट्स में उपयोग करने के लिए हटाया गया हो। एक अन्य संभावना यह है कि ठेकेदारों और अधिकारियों ने मिलकर फर्जी बिलिंग के जरिए सरकारी धन का दुरुपयोग किया हो। एक और पर्यावरण कार्यकर्ता ने कहा, “यह एक बड़ा घोटाला हो सकता है। पौधे लगाने के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं, लेकिन उनकी देखभाल या सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते।
जाँच और सीसीटीवी की माँग
इस मामले ने जाँच की आवश्यकता को और मजबूत किया है। स्थानीय लोग और सामाजिक संगठन माँग कर रहे हैं कि नगर निगम उन क्षेत्रों के सीसीटीवी फुटेज की जाँच करे, जहाँ पौधे लगाए गए थे। साथ ही, स्वतंत्र जाँच समिति गठित करने की माँग भी उठ रही है, जिसमें पर्यावरण विशेषज्ञ और नागरिक प्रतिनिधि शामिल हों
इस घटना ने लखनऊ में पर्यावरण संरक्षण के प्रति सरकारी तंत्र की लापरवाही को उजागर किया है।
ठेकेदारों और लखनऊ में पौधों की चोरी की यह घटना न केवल पर्यावरण संरक्षण के लिए खतरा है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सरकारी तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही की कितनी कमी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की पर्यावरणीय पहल को सफल बनाने के लिए यह जरूरी है कि ऐसी घटनाओं की जाँच हो और दोषियों को सजा दी जाए।



