HomeArticleभारतीय कूटनीति से नहीं,जनता के प्रेम से पिघला ईरान, हॉर्मुज से गुजरने...

भारतीय कूटनीति से नहीं,जनता के प्रेम से पिघला ईरान, हॉर्मुज से गुजरने दिये भारतीय LPG टैंकर

ज़की भारतीय ✍🏼

ईरान-अमेरिका-इजराइल युद्ध के बीच स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में तनाव चरम पर है। फरवरी 2026 के अंत में आयतुल्लाह अली खामनेई की शहादत के बाद ईरान ने इस जलमार्ग को ब्लॉक कर दिया, जो दुनिया के 20-40% तेल-गैस व्यापार का मुख्य रास्ता है। लेकिन मार्च 2026 में दो भारतीय ध्वज वाले LPG टैंकर – शिवालिक और नंदा देवी – को ईरान ने सुरक्षित पास दे दिया। ये जहाज कुल 92,700 मीट्रिक टन LPG लेकर भारत की ओर बढ़े, मुंद्रा और कांडला पोर्ट्स पर पहुंचने वाले थे।

युद्ध की शुरुआत होने के बाद से ईरान ने जवाब में हॉर्मुज को बंद कर दिया, दुश्मन देशों के जहाजों को रोकने की घोषणा की। भारत के लिए यह बड़ा झटका था – हमारी 45% क्रूड ऑयल और ज्यादातर LPG इसी रूट से आती है। कीमतें बढ़ीं, घरेलू गैस सप्लाई प्रभावित हुई। लेकिन 12-13 मार्च को शिवालिक और नंदा देवी को छूट मिली।
रॉयटर्स ने इंडियन सोर्स के हवाले से कहा कि ईरान ने इंडियन-फ्लैग्ड टैंकरों को अनुमति दी, हालांकि ईरानी सोर्स ने किसी एग्रीमेंट से इनकार किया।टाइम्स ऑफ इजराइल ने इसे “रेयर एक्सेप्शन” बताया, इंडियन नेवी की एस्कॉर्ट का जिक्र किया। मरीन इनसाइट ने डिटेल्स दीं कि जहाज 40,000 मीट्रिक टन गैस ले जा रहे थे, और यह ऑपरेशन “केयरफुल” था।

ईरानी बयान: जनता की सहानुभूति पर जोर

ईरान के सुप्रीम लीडर के भारत प्रतिनिधि डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने ANI को बताया कि भारत में लोगों ने अमेरिका-इजराइल के “जुल्म” की निंदा की, ईरान के साथ खड़े हुए। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता की आवाज और सहानुभूति की वजह से जहाजों को मदद दी गई। उनके दिए हुए बयान में भारत की कूटनीतिक डील का कोई जिक्र नहीं hai। ईरानी राजदूत मोहम्मद फतहाली ने भारत को “दोस्त” कहा, लेकिन वजह बताई – जनता का समर्थन।
भारत में अयातुल्लाह खामेनाई की शहादत के बाद दिल्ली, लखनऊ समेत भारत के विभिन्न शहरों में विरोध प्रदर्शन हुए। मुस्लिम और सेकुलर हिंदुओं ने इजराइल- अमेरिका विरोधी नारे लगाए। ईरान ने इसे नजरअंदाज नहीं किया। इलाही ने स्पष्ट कहा,भारतीय दिल ईरान के साथ हैं। ये बयान दिखाते हैं कि पासेज जनता की आवाज से मिला, न कि सरकारी बातचीत से।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि ईरान से डायरेक्ट टॉक्स से रिजल्ट मिले ।लेकिन ये दावे खोखले हैं इन दावों में कोई दम नहीं है।

खामनेई की शहादत पर भारत की चुप्पी क्यों ?

रूस, चीन, पाकिस्तान ने तुरंत संवेदना जताई। भारत ने 5-6 दिन बाद विदेश सचिव से कंडोलेंस बुक साइन कराई। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह जी की तरफ से कोई शोक संदेश जारी नहीं किया गया। यह अमेरिका के दबाव का असर लगता है – चाबहार प्रोजेक्ट पर दबाव, रूसी तेल पर प्रतिबंध। भारत इजराइल से डिफेंस टेक लेता है, लेकिन ईरान से ऊर्जा। यह संतुलन कमजोर दिखा।

क्या कूटनीति फेल हुई?

असली कूटनीति होती है सिद्धांतों पर खड़े रहना। भारत को चाहिए था कि इजराइल-अमेरिका की आलोचना करे – “हमारे मित्र पर हमला अस्वीकार्य” कहकर। लेकिन डर के मारे चुप्पी। ईरान ने फिर भी छूट दी, क्योंकि जनता ने आवाज उठाई। प्रदर्शन, सोशल मीडिया पर ईरान समर्थन ने ईरानी नेतृत्व तक पहुंचा।
ईरान ने साबित किया कि वह अच्छा दोस्त है – भारत को अमेरिका के गुलाम न बनने की सलाह दी जा सकती है।

जनता की जीत, कूटनीति की कमजोरी

ईरान ने जनता की सहानुभूति को क्रेडिट दिया, न कि मोदी-जयशंकर की डिप्लोमेसी को। खामेनाई की मौत पर चुप्पी से भारत की विदेश नीति कमजोर लगी – अमेरिका के प्रभाव से प्रभावित। जनता की आवाज ने रास्ता खोला, सरकार को इससे सीखना चाहिए। ऊर्जा सुरक्षा जरूरी है, लेकिन सम्मान और स्वतंत्रता से। ईरान ने दोस्ती निभाई, अब भारत को अपनी नीति में बदलाव लाना होगा – इजराइल और अमेरिका से दोस्ती रखते हुए ईरान के साथ न्यायपूर्ण रुख अपनाना होगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read