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विशेष गहन पुनरीक्षण पर योगी आदित्यनाथ के बयानों में बदलाव और घुसपैठियों पर सख्ती से वोटर लिस्ट की चिंता तक

ज़की भारतीय

उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों एक बड़ा मुद्दा गरमाया हुआ है – विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के तहत मतदाता सूची की सफाई। चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है, जिसमें मृतकों, डुप्लिकेट एंट्रीज और अयोग्य नामों को हटाया जाना है। लेकिन इस प्रक्रिया ने राजनीतिक हलकों में तूफान खड़ा कर दिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दो अलग-अलग बयानों ने विपक्ष को हमलावर होने का मौका दे दिया है। एक तरफ नवंबर 2025 में घुसपैठियों (इन्फिल्ट्रेटर्स) के खिलाफ सख्त कार्रवाई और हर जिले में अस्थायी डिटेंशन सेंटर बनाने के निर्देश, तो दूसरी तरफ दिसंबर में करीब 4 करोड़ वोटरों के नाम छूटने की चिंता जताते हुए पार्टी कार्यकर्ताओं से अपील करना कि जायज वोटरों के नाम जुड़वाएं। क्या यह बयानों में बदलाव राजनीतिक मजबूरी है या रणनीतिक शिफ्ट? क्या योगी को अब लगने लगा है कि SIR से उनके अपने वोटर प्रभावित हो रहे हैं? इन सवालों पर गौर करना जरूरी है।
SIR प्रक्रिया की शुरुआत चुनाव आयोग ने अक्टूबर 2025 में की थी। यह बिहार के बाद दूसरे चरण में 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चल रही है, जिसमें उत्तर प्रदेश भी शामिल है। इसका मक़सद मतदाता सूची को अपडेट करना है – नए वोटर जोड़ना, पुराने हटाना और गलत एंट्रीज सुधारना। उत्तर प्रदेश में जनवरी 2025 की मतदाता सूची में करीब 15.44 करोड़ नाम थे। लेकिन SIR के दौरान अब तक की गिनती में सिर्फ 12 करोड़ के आसपास नाम दर्ज हुए हैं। मुख्यमंत्री योगी ने दिसंबर 2025 में भाजपा कार्यकर्ताओं की बैठक में कहा कि राज्य की आबादी करीब 25 करोड़ है, जिसमें 65% से ज्यादा वोटिंग एज के हैं, यानी करीब 16 करोड़ वोटर होने चाहिए। लेकिन 4 करोड़ नामों का गैप है, और इनमें से 85-90% उनके (भाजपा के) वोटर हैं। उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि फेक एंट्रीज पर आपत्ति दर्ज करें और छूटे हुए जेनुइन वोटरों के नाम जुड़वाएं। योगी ने खुद गोरखपुर में SIR फॉर्म भरकर उदाहरण पेश किया और लोगों से अपील की कि मतदाता सूची में नाम जुड़वाना लोकतंत्र की मजबूती है।
यह बयान नवंबर के उनके निर्देशों से बिल्कुल उलट लगता है। 22 नवंबर 2025 को योगी आदित्यनाथ ने सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिए थे कि अवैध घुसपैठियों की पहचान करें, हर जिले में अस्थायी डिटेंशन सेंटर बनाएं और उन्हें डिपोर्ट करने की प्रक्रिया शुरू करें। सरकारी बयान में साफ कहा गया कि राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था प्राथमिकता है, कोई अवैध गतिविधि बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह निर्देश SIR के बीच ही आया था, जब चुनाव आयोग घुसपैठियों को मतदाता सूची से हटाने पर जोर दे रहा था। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी SIR को समर्थन देते हुए कहा था कि यह प्रक्रिया हर घुसपैठिए को सूची से हटाएगी और लोकतंत्र की रक्षा करेगी। योगी का वह बयान सख्त था – घुसपैठियों को चुन-चुनकर बाहर निकालने की बात। विपक्ष ने इसे मुस्लिम तुष्टीकरण के खिलाफ और अल्पसंख्यकों को टारगेट करने का आरोप लगाया।
अब सवाल यह है कि इतने कम समय में बयानों में यह बदलाव क्यों? पहले डिटेंशन सेंटर की बात, घुसपैठियों पर सख्ती दिखाते हुए, और अब 4 करोड़ वोटरों के नाम छूटने की चिंता, जिसमें ज्यादातर भाजपा समर्थक बताए जा रहे हैं। क्या योगी को लगने लगा है कि SIR से भाजपा के कोर वोटर प्रभावित हो रहे हैं? उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक हैं। भाजपा के लिए वोटर बेस मजबूत रखना जरूरी है। योगी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को चेताया कि बूथ स्तर पर काम करें, क्योंकि चुनाव बूथ से जीते जाते हैं। उन्होंने अनियमितताओं का जिक्र किया – जैसे एक जिले में बांग्लादेशी नागरिकों के नाम सूची में मिले, या उम्र में गड़बड़ी (बेटा 20 का, पिता 30 का, दादा 40 का)। लेकिन साथ ही छूटे नामों को जोड़ने पर जोर।
विपक्ष इस बदलाव को भाजपा की कमजोरी बता रहा है। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस का कहना है कि SIR गरीब, पिछड़े और अल्पसंख्यक वोटरों को निशाना बना रही है। अन्य राज्यों जैसे बंगाल में 58 लाख नाम हटाए जाने की संभावना है, बिहार में पहले चरण में लाखों नाम कटे। उत्तर प्रदेश में अभी ड्राफ्ट रोल 31 दिसंबर को आएगा, तब साफ होगा कितने नाम हटाए गए। लेकिन योगी का 4 करोड़ का आंकड़ा राजनीतिक है – चुनाव आयोग के अनुसार गैप कम हो सकता है, क्योंकि नए वोटर जोड़ने का समय बाकी है।
यह बदलाव भाजपा की आंतरिक चिंता दर्शाता है। लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में भाजपा को झटका लगा था। अब SIR को अवसर मानते हुए पार्टी वोटर लिस्ट मजबूत करना चाहती है। योगी का बयान कार्यकर्ताओं को एक्टिवेट करने का है। लेकिन पहले घुसपैठियों पर फोकस था, जो हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का मुद्दा है। अब जेनुइन वोटर बचाने की अपील। क्या यह अमित शाह और योगी के बीच मतभेद दिखाता है? कुछ सोशल मीडिया पर ऐसी अफवाहें हैं, लेकिन कोई ठोस सबूत नहीं। शाह ने SIR को समर्थन दिया, योगी ने उसे लागू किया।
बिहार में SIR के दौरान लाखों नाम कटे, वहां भी घुसपैठिए मुद्दा था। उत्तर प्रदेश में नेपाल बॉर्डर होने से घुसपैठ पुराना मुद्दा है। योगी सरकार 2017 से इसे उठाती रही है। लेकिन अब जब बड़े पैमाने पर नाम छूट रहे हैं, तो चिंता स्वाभाविक है। विपक्ष कहता है कि पहले खुश थे क्योंकि मुस्लिम या पिछड़े वोटर कट रहे थे, अब परेशान क्योंकि अपने वोटर प्रभावित। लेकिन भाजपा कहती है कि फेक वोटर हट रहे हैं, जो विपक्ष के लिए फायदेमंद थे।
यह मुद्दा 2027 चुनाव तक गरमाएगा। SIR फरवरी 2026 तक चलेगी। अंतिम सूची से साफ होगा कितने नाम कटे या जुड़े। लेकिन योगी के बयानों का बदलाव राजनीतिक परिपक्वता दिखाता है – सख्ती के साथ वोटर मोबिलाइजेशन। लोकतंत्र में मतदाता सूची शुद्ध होना जरूरी है, लेकिन प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए। अगर गरीब या अल्पसंख्यक प्रभावित होते हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरा। योगी की चिंता अगर सिर्फ अपने वोटरों की है, तो विपक्ष को हमला करने का मौका मिलेगा। कुल मिलाकर, यह SIR नहीं, राजनीतिक रणनीति का खेल बन गया है।

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