HomeCITYमोहर्रम के माहौल को बिगाड़ने की कोशिश पर कार्रवाई की तैयारी

मोहर्रम के माहौल को बिगाड़ने की कोशिश पर कार्रवाई की तैयारी

ज़की भारतीय ✍🏼
लखनऊ, 19 जून। पुराने लखनऊ के सआदतगंज थाना क्षेत्र में स्थित एक निजी इमामबाड़े की मरम्मत को लेकर सोशल मीडिया पर प्रसारित भ्रामक सूचनाओं के बाद पुलिस प्रशासन को तत्काल हस्तक्षेप करना पड़ा। पुलिस जांच में प्रथम दृष्टया यह तथ्य सामने आया कि जिस स्थान को लेकर इमामबाड़े में तोड़फोड़ तथा मोहर्रम के माहौल को प्रभावित करने के आरोप लगाए जा रहे थे, वहां वास्तव में मकान मालिक मौलाना अली अब्बास अपने निजी इमामबाड़े की पुरानी छत की मरम्मत और स्लैब डलवाने का कार्य करा रहे थे, ताकि बरसात के दौरान पानी के रिसाव से भवन को सुरक्षित रखा जा सके। प्राप्त जानकारी के अनुसार मौलाना अब्बास का कहना है कि संबंधित संपत्ति उनके परिवार की पैतृक संपत्ति है, जिसे वर्ष 1901 में उनके पूर्वजों द्वारा क्रय किया गया था। उनके अनुसार यह संपत्ति उनकी माता को ननिहाल पक्ष से प्राप्त हुई थी। बाद में परिवार के सदस्यों के बीच संपत्ति का बंटवारा हुआ, जिसके बाद उन्होंने अपने हिस्से को विधिवत खरीदकर अपने कब्जे में लिया। उनका कहना है कि कई वर्ष पूर्व जर्जर हो चुकी पुरानी छत को हटाकर नई दीवारें तैयार की गई थीं, ताकि भविष्य में उस पर स्लैब डाली जा सके।

मौलाना अब्बास का आरोप है कि पड़ोस में रहने वाली एक महिला के साथ उनका संपत्ति संबंधी विवाद न्यायालय में विचाराधीन है। उनका कहना है कि विवादित पक्ष पर उनके द्वारा यह दावा किया गया है कि जिस भवन में वह महिला निवास करती है, वह भी उनकी पैतृक संपत्ति का हिस्सा है। अब्बास के अनुसार इसी विवाद के चलते उनके निर्माण कार्य पर आपत्तियां उठाई गईं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर ऐसी सूचनाएं प्रसारित कराई गईं, जिनसे यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि मोहर्रम के दौरान किसी सार्वजनिक इमामबाड़े में तोड़फोड़ की जा रही है। संबंधित पोस्टों में पुलिस अधिकारियों, यूपी-112 और अन्य सरकारी अधिकारियों को टैग कर मामले को धार्मिक और संवेदनशील स्वरूप देने का प्रयास किया गया। सूचना मिलते ही सआदतगंज पुलिस मौके पर पहुंची और पूरे प्रकरण की जांच की। क्षेत्रीय पुलिस अधिकारियों तथा थाना प्रभारी द्वारा किए गए निरीक्षण में यह पाया गया कि निर्माण कार्य निजी संपत्ति पर किया जा रहा था तथा वहां किसी सार्वजनिक धार्मिक स्थल को नुकसान पहुंचाने जैसी कोई स्थिति मौजूद नहीं थी। स्थानीय स्तर पर की गई जांच में भी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने अथवा मोहर्रम संबंधी गतिविधियों में बाधा डालने का कोई प्रमाण नहीं मिला। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि मोहर्रम जैसे संवेदनशील अवसर पर बिना सत्यापन के सोशल मीडिया पर इस प्रकार की सूचनाएं प्रसारित करना कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती पैदा कर सकता है तथा सांप्रदायिक सौहार्द को प्रभावित कर सकता है।

मौलाना अब्बास का कहना है कि उनकी संपत्ति को लेकर विपक्षी पक्ष द्वारा कोई स्थगन आदेश प्राप्त नहीं किया गया है और न ही उनके निर्माण कार्य पर किसी सक्षम न्यायालय द्वारा रोक लगाई गई है। उनका आरोप है कि कुछ लोग उनके निर्माण कार्य में बाधा डालकर आर्थिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पहले यूपी-112, फिर स्थानीय पुलिस, एलडीए तथा पुरातत्व विभाग का भय दिखाकर लगातार काम रुकवाने की कोशिश की जा रही है। उनका यह भी आरोप है कि कुछ लोग निजी स्वार्थों के चलते पुलिस और प्रशासन को गुमराह कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक धार्मिक स्थल दरगाह हज़रत अब्बास (अ.स.) का हवाला देकर अब उन्हें पुरातत्व विभाग के नाम पर प्रताड़ित किया जा रहा है, जबकि दरगाह के आसपास 100 से 300 मीटर की परिधि में वर्षों पूर्व दो और तीन मंजिला हजारों भवन निर्मित हो चुके हैं। उनका कहना है कि उनका मकान भी वर्ष 1901 से अस्तित्व में है तथा वह केवल पहले से बनी दीवारों पर स्लैब डलवाकर इमामबाड़े को बरसात से सुरक्षित करने का कार्य करवा रहे हैं, जो पूरी तरह वैध है।

अब्बास ने आरोप लगाया कि कुछ असामाजिक तत्व वसूली की नीयत से न केवल पुलिस को गुमराह कर रहे हैं, बल्कि मोहर्रम के शांतिपूर्ण माहौल को भी प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं। मौलाना का कहना है कि जो महिला मुझपर फर्जी आरोप लगा रही है वो स्वंय तीन मंजिला मकान बिना पुरातत्व विभाग और लखनऊ विकास प्राधिकरण की अनुमति के बनाए हुई है। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर पुलिस या प्रशासन को झूठी सूचना देता है अथवा सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसी भ्रामक जानकारी प्रसारित करता है जिससे सार्वजनिक शांति एवं कानून-व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका उत्पन्न हो, तो जांच में प्राप्त तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत कार्रवाई संभव है। इसके अतिरिक्त सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम तथा साइबर अपराध से संबंधित प्रावधानों के तहत भी मामले की जांच की जा सकती है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि पुराने लखनऊ में कई बार निजी संपत्ति संबंधी विवादों को धार्मिक या विरासत संरक्षण के मुद्दों का रूप देकर प्रशासनिक कार्रवाई को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। हालांकि प्रत्येक मामले में निष्पक्ष जांच और विधिक प्रक्रिया का पालन आवश्यक है तथा किसी भी पक्ष को दोषी मानने से पहले तथ्यों का परीक्षण किया जाना चाहिए। इस प्रकरण में पुलिस द्वारा त्वरित कार्रवाई और मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण किए जाने से संभावित भ्रम की स्थिति समाप्त हो गई। क्षेत्र के लोगों ने पुलिस की तत्परता की सराहना करते हुए मांग की है कि सोशल मीडिया पर अपुष्ट और भ्रामक सूचनाएं प्रसारित करने वाले व्यक्तियों तथा संबंधित सोशल मीडिया हैंडल की भूमिका की भी जांच की जाए, ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति मोहर्रम या अन्य धार्मिक अवसरों पर अफवाह फैलाकर सामाजिक सौहार्द को प्रभावित न कर सके। पुलिस का कहना है कि यदि जांच में झूठी सूचना प्रसारित करने अथवा प्रशासन को गुमराह करने के पर्याप्त साक्ष्य प्राप्त होते हैं तो संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध विधिक कार्रवाई की जाएगी। वहीं स्थानीय नागरिकों का मानना है कि ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई से अफवाह फैलाने वालों पर अंकुश लगेगा और धार्मिक अवसरों पर शांति, सद्भाव तथा सामाजिक सौहार्द का वातावरण बनाए रखने में मदद मिलेगी।

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