HomeINDIAमोदी सरकार का ऐतिहासिक फैसला: 74 वर्षों बाद जातिगत जनगणना को मंजूरी

मोदी सरकार का ऐतिहासिक फैसला: 74 वर्षों बाद जातिगत जनगणना को मंजूरी

लखनऊ, 30 अप्रैल । भारत सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर जातिगत जनगणना कराने का फैसला किया है। यह निर्णय मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में लिया गया। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी घोषणा करते हुए कहा कि यह जनगणना सामाजिक समानता और नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी यह फैसला स्वतंत्र भारत में 74 वर्षों बाद जातिगत जनगणना की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि आखिरी बार 1951 में कुछ हद तक जाति आधारित आंकड़े एकत्र किए गए थे।

निर्णय का महत्व और पृष्ठभूमि

जातिगत जनगणना की मांग लंबे समय से विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों द्वारा उठाई जा रही थी। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे सामाजिक न्याय और आरक्षण की 50% सीमा को तोड़ने का आधार बताते हुए इसकी वकालत की थी। उन्होंने कहा था कि जातिगत जनगणना के बिना सामाजिक-आर्थिक नीतियां अधूरी हैं। विपक्ष के दबाव और सामाजिक संगठनों की मांग के बाद सरकार ने इस दिशा में कदम उठाया।

74 वर्षों का अंतर भारत में 1951 की जनगणना में आंशिक रूप से जाति आधारित आंकड़े एकत्र किए गए थे, लेकिन स्वतंत्र भारत में इसे व्यापक स्तर पर लागू नहीं किया गया। इसके बाद, 2011 में सामाजिक-आर्थिक और जातिगत जनगणना (SECC) की गई थी, लेकिन इसके आंकड़े पूरी तरह से सार्वजनिक नहीं किए गए और नीति निर्माण में इनका उपयोग सीमित रहा। अब, 2025 में लिया गया यह निर्णय 74 वर्षों के अंतराल को समाप्त करता है, जिससे जाति आधारित आंकड़ों का उपयोग सामाजिक कल्याण योजनाओं, आरक्षण नीतियों और संसाधन वितरण में हो सकेगा।

प्रक्रिया और कार्यान्वयन

केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि जनगणना की प्रक्रिया जल्द शुरू होगी, जिसमें सभी जातियों और उप-जातियों के आंकड़े एकत्र किए जाएंगे। इसके लिए एक विशेष समिति गठित की जाएगी, जो प्रक्रिया की निगरानी करेगी। यह जनगणना 2026 की प्रस्तावित जनगणना के साथ समन्वित हो सकती है। सरकार का दावा है कि यह कदम सामाजिक समावेशिता को बढ़ावा देगा और पिछड़े वर्गों के उत्थान में मदद करेगा।

संसद में चर्चा और प्रतिक्रियाएं

हालांकि, संसद में इस मुद्दे पर अभी तक कोई औपचारिक विधेयक पेश नहीं हुआ है, लेकिन मंत्रिमंडल के फैसले को संसद के आगामी सत्र में औपचारिक मंजूरी के लिए पेश किया जा सकता है। विपक्ष ने इस फैसले का स्वागत किया है, लेकिन कुछ नेताओं ने इसे “चुनावी दांव” करार दिया। भाजपा समर्थकों का कहना है कि यह निर्णय सामाजिक न्याय के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जबकि कुछ आलोचकों ने इसे “जातिवाद को बढ़ावा देने वाला” कदम बताया।आलोचना और चुनौतियां
जातिगत जनगणना के समर्थकों का मानना है कि यह सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को दूर करने में मदद करेगा, लेकिन आलोचकों का कहना है कि इससे समाज में जातिगत विभाजन बढ़ सकता है। इसके अलावा, आंकड़ों की सटीकता, गोपनीयता और दुरुपयोग की आशंकाएं भी चुनौतियां पेश कर सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को पारदर्शी और वैज्ञानिक तरीके से इस प्रक्रिया को पूरा करना होगा।
74 वर्षों बाद जातिगत जनगणना का निर्णय भारत के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। यह कदम न केवल नीति निर्माण को प्रभावित करेगा, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता की दिशा में एक नई बहस को भी जन्म देगा। सरकार और विपक्ष दोनों इसे अपने-अपने तरीके से जनता के सामने पेश कर रहे हैं, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे कितनी निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ लागू किया जाता है।

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