क्या है इजरायल और ईरान के बीच रिश्तों में कड़वाहट की वजह ?
लखनऊ, 18 जून। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एक सनसनीखेज बयान दिया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि अमेरिका को ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के ठिकाने की पूरी जानकारी है, लेकिन वे अभी उनकी हत्या नहीं करना चाहते। यह बयान ऐसे समय में आया है, जब मध्य पूर्व में इजरायल और ईरान के बीच तनाव चरम पर है। ट्रंप का यह बयान महज जबान से प्रहार करने जैसा है, क्योंकि जबान से कोई भी कह सकता है कि वह किसी को मार देगा या किसी देश को तबाह कर देगा। जबान पर कोई टैक्स नहीं लगता, और अमेरिका जैसे देश की बात हो, जिसके पीछे कई देश सुबह-शाम उसकी चापलूसी में लगे रहते हैं और उसके एक फोन पर वह सब करते हैं जो वह चाहता है, तो ऐसे बयानों का असर गहरा होता है।
हालांकि, ईरान इन देशों से अलग है। वह न तो दूसरों के मामलों में दखल देता है और न ही अपने देश में किसी की दखलंदाजी बर्दाश्त करता है। ईरान का तटस्थ रवैया और उसका मजलूमों के प्रति समर्थन उसे इजरायल के खिलाफ खड़ा करता है। इजरायल और ईरान के बीच रिश्तों में कड़वाहट की वजह स्पष्ट नहीं, लेकिन ईरान मुस्लिम देशों पर होने वाले अत्याचार बर्दाश्त नहीं करता। खास तौर पर, इजरायल को वह इसलिए निशाना बनाता है, क्योंकि वह इसे क्षेत्र का सबसे बड़ा आतंकवादी देश मानता है।
इजरायल का इतिहास भी विवादों से भरा है। जब यहूदी, हिटलर की तानाशाही से तंग आकर फिलिस्तीन में आए और वहाँ इजरायल की स्थापना की, तो फिलिस्तीनियों ने शायद ही सोचा होगा कि ये नंगे-भूखे लोग, जो आज शरण माँग रहे हैं, कल उन्हें तबाह और बर्बाद करेंगे। इजरायल ने फिलिस्तीन में कोई कसर नहीं छोड़ी—मासूमों, औरतों, बच्चों पर अत्याचार किए, अस्पतालों पर हमले किए, और उसे कब्रिस्तान बना दिया। न सिर्फ फिलिस्तीन, बल्कि अन्य देशों में भी इजरायल ने तबाही मचाई। तमाम मुस्लिम देशों के होते हुए भी सिर्फ ईरान ने खुलकर इसका विरोध किया। ईरान ने न केवल आवाज उठाई, बल्कि हिजबुल्लाह और उसके नेता हसन नसरल्लाह को समर्थन देकर इजरायल के खिलाफ मजबूत रुख अपनाया।
क्यों खटकता है इजरायल को ईरान ?
हर धर्म सिखाता है कि मजलूम की मदद करो, चाहे वह यहूदी हो, ईसाई हो, पारसी हो, मुसलमान हो या हिंदू। ईरान, इजरायल को इसलिए खटकता है, क्योंकि उसकी मनमानी ईरान के सामने नहीं चल पाती। हाल के हमलों में ईरान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि इजरायल पर हुए हमले तो बस एक हल्का सा ट्रायल हैं। ईरान के पास 2,000 किलोमीटर की रेंज वाली मिसाइलें हैं, जो सटीक निशाना साध सकती हैं। अगर भविष्य में भारी हथियारों का इस्तेमाल हुआ, तो इजरायल भी जवाबी हमले कर सकता है, क्योंकि उसके पास भी ताकतवर हथियार हैं।
यदि अमेरिका इस जंग में इजरायल का साथ देता है, तो ईरान के पक्ष में भी कई देश खड़े हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में तीसरे विश्व युद्ध की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। वैश्विक समुदाय से संयम और कूटनीतिक हस्तक्षेप की जरूरत है, ताकि मध्य पूर्व में शांति बनी रहे।
मंगलवार को ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा, “हम जानते हैं कि खामेनेई कहाँ छिपे हैं। हम उन्हें जब चाहें खत्म कर सकते हैं, लेकिन अभी के लिए ऐसा नहीं करेंगे।” उन्होंने ईरान से बिना शर्त आत्मसमर्पण की मांग की और कहा कि युद्ध से बचने का एकमात्र रास्ता कूटनीतिक समझौता है। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका इजरायल का सबसे बड़ा सहयोगी है और वह इजरायल की सुरक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएगा। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हाल के इजरायली हमलों में अमेरिका की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी।
खामेनेई की सुरक्षा: अभेद्य किला?
अयातुल्ला खामेनेई की सुरक्षा व्यवस्था को दुनिया की सबसे सघन और जटिल सुरक्षा व्यवस्थाओं में से एक माना जाता है। ईरान की इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के विशेष दस्ते उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालते हैं। खामेनेई के ठिकाने को गुप्त रखने के लिए कई स्तरों पर सुरक्षा प्रोटोकॉल अपनाए जाते हैं, जिसमें डिकॉय (नकली) काफिले, इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग, और भूमिगत बंकर शामिल हैं।सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि खामेनेई को निशाना बनाना आसान नहीं है। ईरान की वायु रक्षा प्रणालियाँ, विशेष रूप से रूसी S-300 और स्वदेशी बावर-373 सिस्टम, हवाई हमलों को विफल करने में सक्षम हैं। इसके अलावा, खामेनेई की गतिविधियों की जानकारी बेहद गोपनीय रखी जाती है, जिससे किसी भी विदेशी खुफिया एजेंसी के लिए उनकी सटीक लोकेशन का पता लगाना मुश्किल होता है।
इजरायल और अमेरिका की रणनीति
इजरायल, जो ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है, लंबे समय से खामेनेई के नेतृत्व को कमजोर करने की कोशिश में है। हाल ही में इजरायल ने “ऑपरेशन राइजिंग लायन” के तहत ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हमले किए, जिसमें 200 से ज्यादा लोग मारे गए। इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने धमकी दी कि जल्द ही तेहरान के आसमान में इजरायली वायुसेना के विमान दिखाई देंगे।ट्रंप ने इजरायल के इन हमलों का समर्थन किया, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि अमेरिका अभी युद्ध में सीधे शामिल नहीं होगा। उन्होंने ईरान को 60 दिन का अल्टीमेटम दिया था कि वह परमाणु समझौते पर बातचीत करे, लेकिन ईरान ने इसे ठुकरा दिया। अमेरिका ने मध्य पूर्व में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा दी है। यूएसएस थियोडोर रूजवेल्ट और यूएसएस अब्राहम लिंकन जैसे एयरक्राफ्ट कैरियर्स को फारस की खाड़ी और रेड सी में तैनात किया गया है। यह कदम न केवल इजरायल की रक्षा के लिए, बल्कि ईरान की किसी भी जवाबी कार्रवाई को रोकने के लिए भी उठाया गया है।
ईरान का जवाब और क्षेत्रीय तनाव
ईरान ने इजरायली हमलों को अपनी संप्रभुता का उल्लंघन करार दिया और जवाबी हमले किए, जिसमें तेल अवीव में अमेरिकी दूतावास के आसपास मिसाइलें गिरीं। ईरान ने यह भी दावा किया कि उसने इजरायल के दो F-35 लड़ाकू विमानों को मार गिराया, हालांकि इजरायल ने इसे प्रचार करार दिया। ईरान ने धमकी दी है कि यदि उसकी परमाणु सुविधाओं पर और हमले हुए, तो वह अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाएगा। इस बीच, ट्रंप ने चेतावनी दी कि अगर ईरान ने अमेरिकी हितों पर हमला किया, तो अमेरिकी सेना “पूरी ताकत” से जवाब देगी।
अमेरिका की दुविधा
ट्रंप के सामने एक जटिल स्थिति है। एक ओर, वे इजरायल के सबसे बड़े सहयोगी हैं और इजरायल की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। दूसरी ओर, उन्होंने अपने दोनों कार्यकालों में मध्य पूर्व के युद्धों से अमेरिका को बाहर रखने का वादा किया था। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का खामेनेई पर बयान एक मनोवैज्ञानिक दबाव की रणनीति हो सकती है, जिसका मकसद ईरान को बातचीत की मेज पर लाना है। हालांकि, अगर अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई में इजरायल का साथ दिया, तो यह क्षेत्रीय युद्ध को और भड़का सकता है, जिसके परिणामस्वरूप तेल की कीमतों में उछाल, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, और भारी जनहानि हो सकती है।निष्कर्षइजरायल-ईरान तनाव और ट्रंप के बयानों ने मध्य पूर्व को एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। खामेनेई की अभेद्य सुरक्षा व्यवस्था और ईरान की जवाबी क्षमता इस संघर्ष को और जटिल बनाती है। ट्रंप की कूटनीतिक अपील और सैन्य धमकियों के बीच, वैश्विक समुदाय इस क्षेत्र में शांति की उम्मीद कर रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या अमेरिका और इजरायल की रणनीति शांति लाएगी



