लखनऊ, 7 अक्टूबर । सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को एक अभूतपूर्व घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया, जब वकील राकेश किशोर ने मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई की ओर जूता फेंकने का प्रयास किया। यह घटना CJI गवई के हालिया विवादास्पद बयान से जुड़ी बताई जा रही है, जिसमें उन्होंने मध्य प्रदेश के खजुराहो मंदिर में क्षतिग्रस्त भगवान विष्णु की मूर्ति को बहाल करने की याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा था, “मूर्ति से ही पूछ लो।” इस टिप्पणी को कुछ हिंदूवादी समूहों ने ‘सनातन धर्म का अपमान’ करार दिया।
सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर 1 में सुबह करीब 11:35 बजे सुनवाई के दौरान 71 वर्षीय वकील राकेश किशोर ने अचानक हंगामा मचाया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, उन्होंने अपना जूता उतारा और CJI की बेंच की ओर फेंकने की कोशिश की, साथ ही नारे लगाए, “सनातन धर्म का अपमान बर्दाश्त नहीं होगा। भारत सनातन का अपमान नहीं सहेगा।” जूता बेंच तक नहीं पहुंचा, लेकिन जस्टिस विनोद चंद्रन के करीब से गुजर गया। सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत किशोर को हिरासत में ले लिया। CJI गवई ने शांत रहते हुए कहा, “ये बातें मुझे प्रभावित नहीं करतीं, कार्यवाही जारी रखें।” बाद में किशोर को रिहा कर दिया गया, लेकिन बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) ने तत्काल उनके वकालत लाइसेंस को निलंबित कर दिया।
BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने कहा, “यह कृत्य अदालत की गरिमा के विपरीत है और एडवोकेट्स एक्ट, 1961 का उल्लंघन है।” किशोर अब देश के किसी भी कोर्ट में प्रैक्टिस नहीं कर सकेंगे। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने भी घटना की निंदा की और मीडिया पर सनसनीखेज कवरेज का आरोप लगाया।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट कर घटना की निंदा की, “यह निंदनीय कृत्य है, जो हमारे समाज में ऐसी हरकतों के लिए कोई जगह नहीं।” कांग्रेस नेता सोनिया गांधी ने इसे “संविधान पर हमला” बताया और सभी जजों से एकजुट होकर बयान जारी करने की मांग की। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने भी निंदा की। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसे “सोशल मीडिया की गलत सूचना का नतीजा” करार दिया।
हालांकि, विपक्षी दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पुलिस की निष्क्रियता पर सवाल उठाए। पूर्व जज और सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने इसे “जातिवादी हमला” बताया, क्योंकि CJI गवई दलित समुदाय से हैं। उन्होंने कहा, “यह सुप्रीम कोर्ट पर सीधा जातिगत हमला है, सभी जजों को एकजुट होकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी चाहिए।”
घटना के बाद पुलिस ने किशोर को केवल हिरासत में लिया, लेकिन कोई FIR दर्ज नहीं की। सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार ने कार्रवाई न करने का निर्देश दिया, जिसके बाद उन्हें शाम तक रिहा कर दिया गया। आलोचकों का कहना है कि यह पुलिस की पक्षपातपूर्णता को दर्शाता है। बरेली दंगों या अन्य घटनाओं में पुलिस स्वत: संज्ञान लेकर मुकदमा दर्ज करती है, लेकिन यहां CCTV फुटेज और मीडिया कवरेज के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई।
यदि प्रधानमंत्री या उत्तर प्रदेश के CM योगी आदित्यनाथ पर ऐसा प्रयास होता, तो तत्काल सख्ती होती, ऐसा विपक्ष का आरोप है। किशोर, जो RSS समर्थक और हिंदूवादी बयानों के लिए जाने जाते हैं, को “गोल्ड मेडलिस्ट” बताकर खुद को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना न्यायपालिका की सुरक्षा पर सवाल खड़े करती है। US या अल्बानिया जैसे देशों में कोर्ट में जजों पर हमले घातक साबित हुए हैं, इसलिए भारत को भी सतर्क रहना चाहिए।
वकील किशोर का बैकग्राउंड
राकेश किशोर दिल्ली के मयूर विहार के निवासी हैं और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के सदस्य। वे खजुराहो मामले में CJI के बयान से नाराज थे। घटना के बाद उन्होंने कहा, “मैंने कुछ नहीं किया, ये सब गलतफहमी है।” लेकिन वीडियो फुटेज में जूता फेंकने का प्रयास साफ दिख रहा है। BCI ने अनुशासनात्मक जांच शुरू कर दी है।
यह घटना भारत की न्याय व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करती है, जहां जाति, धर्म और राजनीति न्याय के रास्ते में बाधा बन रही हैं। वकीलों में जो एकता है, वही जजों को भी दिखानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को FIR दर्ज करने और सुरक्षा मजबूत करने का आदेश देना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।



