लखनऊ, 8 अक्टूबर । सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश (सीजीआई) बी.आर. गवई पर जूता फेंकने वाले अधिवक्ता राकेश किशोर के खिलाफ दलित संगठनों और आम आदमी पार्टी (आप) कार्यकर्ताओं ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। कल दिल्ली के मयूर विहार स्थित अधिवक्ता के आवास के बाहर सैकड़ों लोगों ने जूता माला लेकर जुलूस निकाला, जिसमें ‘जय भीम’ और ‘सीजीआई का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान’ जैसे नारे गूंजे। यह प्रदर्शन सीजीआई गवई के दलित होने के नाते इस घटना को जातिगत अपमान के रूप में देखते हुए आयोजित किया गया।
घटना की शुरुआत 6 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के कोर्ट नंबर 1 में हुई, जब 71 वर्षीय अधिवक्ता राकेश किशोर ने सीजीआई गवई की एक टिप्पणी को ‘सनातन धर्म का अपमान’ बताते हुए अपना जूता फेंकने का प्रयास किया। किशोर ने नारे लगाए, ‘सनातन का अपमान नहीं सहेगा हिंदुस्तान’। हालांकि, जूता सीधे सीजीआई तक नहीं पहुंचा और सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें तुरंत हिरासत में ले लिया। सीजीआई गवई ने शांत रहते हुए कहा, ‘इन बातों से विचलित न हों, कार्यवाही जारी रखें।’
प्रदर्शन का नेतृत्व आप के दिल्ली अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने किया। उन्होंने डॉ. बी.आर. अंबेडकर की तस्वीरें और जूतों की सांकेतिक माला लेकर मार्च का नेतृत्व किया। भारद्वाज ने कहा, ‘यह केवल एक जज पर हमला नहीं, बल्कि संविधान और दलित समुदाय की गरिमा पर प्रहार है। भाजपा समर्थित ट्रोल सीजीआई को महीनों से निशाना बना रहे हैं, लेकिन सरकार चुप है।’
प्रदर्शनकारियों ने किशोर के अपार्टमेंट के बाहर बैरिकेडिंग तोड़ी, लेकिन पुलिस ने हस्तक्षेप कर किसी हिंसा को रोका। यह जुलूस करीब दो घंटे चला।
किशोर को घटना के बाद कोई पछतावा नहीं हुआ। उन्होंने कहा, ‘मैंने जो किया, वह सनातन धर्म की रक्षा के लिए था। सीजीआई की टिप्पणी (16 सितंबर को विष्णु मूर्ति से जुड़े पीआईएल को ‘पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन’ कहना) बर्दाश्त के बाहर थी।’
आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने कहा, ‘दलित बेटे का सर्वोच्च पद पर पहुंचना कुछ लोग बर्दाश्त नहीं कर पाते।’ कांग्रेस ने इसे ‘जातिगत पूर्वाग्रह’ करार दिया। यह घटना न्यायपालिका की स्वतंत्रता और दलित जागरूकता पर बहस छेड़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह भारत की गहरी सामाजिक खाई को उजागर करती है।



