शायरे अहलेबैत कैसर अकील के इंतकाल से मुंबई समेत दुनिया भर में रंज-ओ-ग़म का माहौल
लखनऊ, 31 मई। मुंबई के मशहूर शायरे अहलेबैत कैसर अकील साहब का आज लगभग 72 वर्ष की आयु में मुंबई स्थित उनके निवास पर इंतकाल हो गया। मरहूम का ताल्लुक नौगावां सआदात से था, लेकिन उनकी पैदाइश मुंबई में ही हुई थी। उनके इंतकाल की खबर ने न केवल मुंबई के शिया समुदाय में, बल्कि हिंदुस्तान, पाकिस्तान और दुनिया भर में उनके चाहने वालों के बीच गम का माहौल पैदा कर दिया है।कैसर अकील साहब न सिर्फ एक मकबूल शायरे अहलेबैत थे, बल्कि मुशायरों की दुनिया में भी उनका नाम किसी तआर्रुफ का मोहताज नहीं था। उन्होंने मुशायरों को इसलिए अलविदा कह दिया था, क्योंकि उनका मानना था कि अहलेबैत (अ.स.) की मदह-ओ-सना के बाद मुशायरों में शिरकत करना उन्हें पसंद नहीं था। उनकी शायरी में अहलेबैत (अ.स.) के प्रति गहरी अकीदत और मोहब्बत झलकती थी, जो उनके कलाम को अनमोल बनाती थी।मरहूम एक माहिर नाजिम भी थे और उन्होंने निजामत के फन को अपने शागिर्दों में इस खूबी के साथ बांटा कि आज उनकी विरासत को उनके शागिर्द बखूबी संभाले हुए हैं। उनकी शायरी नौगावां सआदात और मुंबई की तमाम अंजुमनों में पढ़ी जाती है, और उनके नोहे व सलाम इन अंजुमनों की पहचान बन चुके हैं। उनकी शायरी का जादू ऐसा था कि उनकी रचनाएं सुनने वालों के दिलों को छू लेती थीं।कैसर अकील साहब की शख्सियत का एक पहलू उनकी इंसानियत थी, जो उन्हें औरों से अलग बनाती थी। वह सौम व सलात के पाबंद, खुशमिजाज, और नेक अखलाक के मालिक थे। उनकी पहली मुलाकात में ही लोग उनके व्यक्तित्व से प्रभावित हो जाते थे। वह न सिर्फ एक महान शायर थे, बल्कि एक ऐसे इंसान थे जिनमें इंसानियत की मिसाल कायम थी। उनकी उदारता और दूसरों की मदद करने का जज्बा उनकी सबसे बड़ी खूबी थी। वह बंद मुट्ठी से जरूरतमंदों की मदद करते थे और कभी इसका दिखावा नहीं किया।यद्यपि उनका कारोबार बड़ा था और वह हमेशा व्यस्त रहते थे, फिर भी मजलिसों और महफिलों में उनकी मौजूदगी हमेशा महसूस की जाती थी। उनकी कमी को पूरा करना लगभग नामुमकिन है, क्योंकि उनकी शायरी और उनकी शख्सियत दोनों ही बेमिसाल थीं। अहलेबैत (अ.स.) की शायरी का सिलसिला भले ही कभी खत्म न हो, लेकिन कैसर अकील साहब का अंदाज-ए-बयां और उनकी शायरी का रंग शायद ही कोई दोहरा सके।खबर लिखे जाने तक मरहूम की तदफीन नहीं हो सकी थी। उनके इंतकाल से जो खालीपन पैदा हुआ है, उसे भरना मुश्किल है। उनके चाहने वाले और शिया समुदाय उनकी यादों को हमेशा संजोकर रखेगा। अल्लाह मरहूम की मगफिरत फरमाए और उन्हें जन्नतुल फिरदौस में आला मुकाम अता करे। आमीन।



