ज़की भारतीय
लखनऊ विश्वविद्यालय (University of Lucknow) उत्तर प्रदेश की सबसे पुरानी और प्रमुख सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में से एक है, जिसकी स्थापना 1920-1921 में हुई। इसका मुख्य कैंपस बादशाह बाग (Badshah Bagh) नामक ऐतिहासिक स्थान पर स्थित है, जो गोमती नदी के उत्तर में फैला हुआ एक विशाल बाग था। यह भूमि मूल रूप से अवध के नवाबों के काल की है, लेकिन 1857 की क्रांति (जिसे ब्रिटिश “म्यूटिनी” कहते थे) के बाद ब्रिटिश शासन ने इसे जब्त कर लिया और नीलामी में बेच दिया। आज यह विवाद का विषय बन गया है, खासकर लाल बारादरी (Lal Baradari) में स्थित मस्जिद के संदर्भ में, जहां हाल ही में (2026 में) सुरक्षा कारणों से इसे सील किया गया, जिससे छात्रों में विरोध हुआ।
यह लेख ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है, जिसमें नवाबी काल, ब्रिटिश कालीन जब्ती, नीलामी, और बाद में विश्वविद्यालय को सौंपे जाने की प्रक्रिया शामिल है। मुख्य मुद्दा यह है कि क्या ब्रिटिश काल की जब्ती और नीलामी को “उचित” माना जा सकता है, जबकि ब्रिटिश शासन को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अत्याचारों के लिए जाना जाता है। साथ ही, मस्जिद नवाबों द्वारा बनवाई गई थी, तो क्या विश्वविद्यालय का उस पर “कब्जा” नैतिक रूप से सही है?
बादशाह बाग का नवाबी मूल और निर्माण
बादशाह बाग अवध के नवाबों द्वारा विकसित एक शाही बाग था। इसका निर्माण नवाब नसीरुद्दीन हैदर ने 1827-1837 में करवाया था। यह उनके पिता गाजी-उद-दीन हैदर, अवध के पहले राजा, 1814-1827 के समय की शुरुआत में था। यह बाग नवाब की रानियों के लिए पिकनिक स्पॉट के रूप में बनाया गया था, जहां वे छतर मंजिल पैलेस से गोमती नदी पार करके नावों से आती थीं।
बादशाह बाग लगभग 90 एकड़ से ज्यादा फैला था (कुछ स्रोतों में 700 हेक्टेयर तक का उल्लेख अवध एस्टेट्स का है, लेकिन मुख्य बाग 90 एकड़ का था)। इसमें लाल बारादरी जैसी इमारतें शामिल थीं। यह नवाबी पीरियड (18वीं-19वीं सदी) की विरासत है, जहां अवध नवाबों ने लखनऊ को कला, संस्कृति और वास्तुकला का केंद्र बनाया।
1857 की क्रांति के बाद ब्रिटिश जब्ती और नीलामी
1857 की क्रांति में अवध नवाबों और स्थानीय लोगों ने ब्रिटिश के खिलाफ लड़ाई लड़ी। क्रांति दबने के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने अवध को पूरी तरह कब्ज़े में लिया (1856 में पहले ही annexation हो चुका था, लेकिन 1857 ने इसे मजबूत किया)। बादशाह बाग सहित कई नवाबी संपत्तियां जब्त की गईं।
ब्रिटिश सरकार ने बादशाह बाग को नीलामी में बेच दिया। इसे कपूरथला के महाराजा रंधीर सिंह ने मात्र 35,000 रुपये में खरीदा। यह कीमत उस समय बहुत कम थी ।
कहा जाता है, ब्रिटिश ने इसे सजा के रूप में जब्त किया था। कपूरथला के महाराजा ब्रिटिश के वफादार थे और 1857 में उन्होंने ब्रिटिश की मदद की थी, इसलिए उन्हें अवध एस्टेट्स में से पुरस्कार मिले।
यहां मुख्य सवाल उठता है: क्या यह नीलामी “उचित” थी? ब्रिटिश शासन को भारतीय इतिहास में उपनिवेशवाद, टैक्स, लूट और अत्याचारों के लिए जाना जाता है। स्वतंत्रता संग्राम में लाखों लोगों ने जान दी, गांधीजी जैसे नेताओं ने अहिंसा से लड़ाई लड़ी, और 1947 में आजादी मिली। ब्रिटिश ने “डाका डाला” (looted) और संपत्तियां जब्त कीं। ऐसे में, जब्त की गई जमीन की नीलामी को लीगल मानना नैतिक रूप से विवादास्पद है। कई इतिहासकार इसे “कॉलोनियल लूट” का हिस्सा मानते हैं। नवाबों की संपत्ति उनके वंशजों या स्थानीय लोगों की होनी चाहिए थी, न कि ब्रिटिश द्वारा बेची जानी चाहिए।
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*विश्वविद्यालय को भूमि कैसे मिली?”
1905 में ब्रिटिश सरकार ने बादशाह बाग की लगभग 90 एकड़ जमीन कैनिंग कॉलेज जो बाद में लखनऊ विश्वविद्यालय बना को सौंप दी। यह लीज पर थी, जिसमें सालाना किराया सिर्फ 3 रुपये था। कपूरथला के महाराजा ने इसे लीज पर दिया।
कैनिंग कॉलेज की स्थापना 1864 में हुई थी (1857 के बाद कैनिंग की याद में)। 1920 में लखनऊ विश्वविद्यालय का एक्ट पास हुआ, और 1921 से यह यहां शिफ्ट हो गया। कुछ स्रोतों में महमूदाबाद के राजा सर मोहम्मद अली मोहम्मद खान का नाम आता है, जिन्होंने विश्वविद्यालय स्थापना के लिए 1 लाख रुपये और अन्य योगदान दिए। लेकिन मुख्य भूमि कपूरथला से आई।
यहां तालुकदारों (जैसे कपूरथला, महमूदाबाद) की भूमिका थी, जो ब्रिटिश काल में वफादार थे और संपत्तियां प्राप्त करते थे।
इतिहास में तालुकदार ब्रिटिश से सहयोग करते थे ताकि अपनी संपत्ति बचाएं, जबकि नवाब जैसे वाजिद अली शाह को निर्वासित किया गया।
लाल बारादरी और मस्जिद का इतिहास
लाल बारादरी लाल पत्थर से बनी एक ऐतिहासिक इमारत है, जो ASI संरक्षित है। इसका निर्माण गाजी-उद-दीन हैदर ने 1814 में शुरू करवाया और नसीरुद्दीन हैदर ने 1820 के आसपास पूरा किया (कुछ स्रोत 1827 में 35 लाख रुपये खर्च का जिक्र)। यह नवाबी दरबार या इमामबाड़ा जैसी थी, लेकिन इसमें मस्जिद भी शामिल है। यह मुस्लिम नवाबों द्वारा बनवाई गई थी, और नवाबी पीरियड की है।
विश्वविद्यालय बनने पर यह कैंपस का हिस्सा बन गई। हाल ही में (2026 में) इमारत जर्जर होने (70% गिरने का खतरा) के कारण प्रशासन ने इसे सील किया, मरम्मत के लिए। इससे मुस्लिम छात्रों ने विरोध किया, बाहर नमाज पढ़ी। कुछ हिंदू छात्रों ने हनुमान चालीसा पढ़कर विरोध किया, लेकिन कई हिंदू छात्रों ने मुस्लिम छात्रों की सुरक्षा के लिए ह्यूमन चेन बनाई, जो सांप्रदायिक सद्भाव का उदाहरण है। विश्विद्यालय प्रशासन द्वारा कहा गया है,विवाद इमारत की सुरक्षा बनाम धार्मिक उपयोग का है, न कि मालिकाना हक का।
ऐतिहासिक न्याय का सवाल
यह भूमि नवाबों की थी, ब्रिटिश ने जब्त की, नीलामी की, और तालुकदारों को सौंपी। विश्वविद्यालय शिक्षा के लिए उपयोगी है, लेकिन मूल मालिकाना हक नवाबी विरासत पर सवाल उठता है। ब्रिटिश अत्याचारों को देखते हुए, जब्ती को “लीगल” मानना कठिन है। मस्जिद नवाबों द्वारा बनवाई गई, इसलिए मस्जिद बाय नेचर वक्फ है और
इसका धार्मिक महत्व बरकरार है।
आजादी के बाद ऐसी कई संपत्तियां सरकारी/शैक्षणिक उपयोग में आईं, लेकिन नैतिक बहस बनी रहती है। लाल बारादरी का संरक्षण और उपयोग दोनों जरूरी हैं। यह लखनऊ की साझा विरासत है, जहां नवाबी गौरव, ब्रिटिश काल और आधुनिक शिक्षा मिलते हैं। विवाद गहरा है, लेकिन सद्भाव से हल होना चाहिए।




