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योगी आदित्यन के कार्यकाल की उपलब्धियां, कमियां और लोकतांत्रिक मर्यादा पर सवाल

ज़की भारतीय

लखनऊ, 20 अप्रैल। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कार्यकाल 2017 से शुरू हुआ और इसे कई उपलब्धियों के साथ-साथ कुछ विवादों और कमियों के लिए भी जाना गया। योगी सरकार ने जहां विकास, निवेश और कानून-व्यवस्था में कुछ उल्लेखनीय कदम उठाए, वहीं उनके कुछ बयानों और नीतियों ने सवाल भी पैदा किए हैं, खासकर एक लोकतांत्रिक देश के मुख्यमंत्री की मर्यादा और निष्पक्षता के संदर्भ में। इस लेख में योगी के कार्यकाल की तारीफ, उनकी कमियां, सरकारी नौकरियों, कर्मचारियों की पेंशन, विकास कार्यों, विवादित बयानों और एक विशेष समुदाय को निशाना बनाने जैसे मुद्दों पर चर्चा की जाएगी, साथ ही यह भी देखा जाएगा कि वे कुछ समुदायों के उग्र व्यवहार पर कार्रवाई क्यों नहीं करते।

योगी आदित्यनाथ की उपलब्धियां

उत्तर प्रदेश को निवेश के लिए आकर्षक बनाने में योगी सरकार ने सफलता हासिल की। ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट और विभिन्न औद्योगिक नीतियों के जरिए राज्य में निवेश का माहौल बना।

कानून-व्यवस्था में सुधार

अपराधियों पर सख्ती, विशेषकर एनकाउंटर और बुलडोजर नीति के जरिए, ने संगठित अपराध पर कुछ हद तक अंकुश लगाया।

धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन

महाकुंभ 2025 और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण जैसे आयोजनों ने उत्तर प्रदेश को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाई।

ग्रामीण विकास

मुख्यमंत्री ग्राम उद्योग योजना और स्वच्छ भारत मिशन के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं को बढ़ावा देने के प्रयास हुए।

योगी सरकार की कुछ नीतियां और कार्यप्रणाली ने सवाल खड़े किए

बेरोजगारी

युवाओं के लिए रोजगार के अवसर सीमित हैं। सरकारी नौकरियों में भर्ती प्रक्रिया में देरी और निजी क्षेत्र में रोजगार की कमी ने असंतोष को जन्म दिया।

स्वास्थ्य सेवाएं

ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पतालों की स्थिति खराब है। कोविड-19 के दौरान स्वास्थ्य ढांचे की कमियां सामने आईं, जो अब भी पूरी तरह सुधरी नहीं हैं।शिक्षा क्षेत्र: स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की कमी, साथ ही बुनियादी ढांचे की खराब स्थिति, शिक्षा के स्तर को प्रभावित कर रही है।

पेंशन विवाद

पुरानी पेंशन योजना (OPS) की मांग को ठुकराने से कर्मचारियों में नाराजगी है। राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) को लेकर असंतोष बना हुआ है।

लोकतांत्रिक मर्यादा और विवादित बयान

एक लोकतांत्रिक देश में मुख्यमंत्री जैसे पद पर बैठे व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी भाषा और व्यवहार में संयम और निष्पक्षता बनाए रखे। योगी आदित्यनाथ के कुछ बयानों ने इस मर्यादा पर सवाल उठाए हैं। उनके भाषणों में अक्सर एक विशेष समुदाय को निशाना बनाया जाता है, जिसे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के रूप में देखा जाता है। उदाहरण के लिए, अपराधियों को संबोधित करते समय उनके बयान कभी-कभी एक समुदाय विशेष से जोड़ दिए जाते हैं, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ता है।इसके विपरीत, कुछ अन्य समुदायों के उग्र व्यवहार पर उनकी चुप्पी सवाल खड़े करती है। मस्जिदों के सामने आपत्तिजनक नारे लगाने, असलहों का प्रदर्शन करने या गुंडागर्दी करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की कमी देखी गई है। यह दोहरा रवैया उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाता है। एक लोकतांत्रिक नेता को सभी समुदायों के प्रति समान व्यवहार करना चाहिए और अपनी भाषा में ऐसी मर्यादा रखनी चाहिए जो सामाजिक एकता को बढ़ाए, न कि उसे तोड़े।

अखिलेश यादव और मायावती से तुलना

अखिलेश यादव (2012-2017):

उपलब्धियां:

लखनऊ मेट्रो, आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे और लैपटॉप वितरण जैसी योजनाओं ने युवाओं और शहरी विकास को बढ़ावा दिया।

कमियां

कानून-व्यवस्था में कमजोरी और भ्रष्टाचार के आरोप उनकी सरकार की कमजोरियां थीं।

योगी से तुलना

अखिलेश ने विकास परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि योगी का जोर हिंदुत्व और अपराध नियंत्रण पर रहा। अखिलेश की तुलना में योगी के बयान अधिक विवादास्पद रहे।

मायावती (2007-2012):उपलब्धियां

दलित समुदाय के उत्थान और नोएडा-ग्रेटर नोएडा जैसे क्षेत्रों में विकास कार्य उल्लेखनीय थे।

कमियां:

स्मारकों पर अत्यधिक खर्च और सामाजिक समावेश की कमी उनकी आलोचना का कारण बनी।

योगी से तुलना

मायावती ने सामाजिक न्याय पर जोर दिया, जबकि योगी की नीतियां धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान पर केंद्रित रहीं। मायावती के बयान कम विवादास्पद थे, लेकिन उनकी सरकार की पहुंच सीमित थी।

सरकारी नौकरियां

योगी सरकार ने सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता लाने का दावा किया, लेकिन भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और सीमित अवसरों ने युवाओं को निराश किया। अखिलेश सरकार ने पुलिस और शिक्षक भर्ती में तेजी दिखाई थी, जबकि मायावती के कार्यकाल में भर्तियां कम थीं। योगी सरकार को रोजगार सृजन में और प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है।कर्मचारियों की पुरानी पेंशन योजना की मांग को ठुकराने से कर्मचारियों में असंतोष है। अखिलेश और मायावती के कार्यकाल में यह मुद्दा कम विवादास्पद था। योगी सरकार को कर्मचारी हितों को ध्यान में रखकर इस मुद्दे पर विचार करना चाहिए।

विकास कार्य

योगी सरकार ने गंगा एक्सप्रेसवे, जेवर हवाई अड्डा और अयोध्या के विकास जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स शुरू किए। हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी अब भी बनी हुई है। अखिलेश ने शहरी विकास पर जोर दिया, जबकि मायावती ने कुछ क्षेत्रों में ही विकास को बढ़ावा दिया। योगी को ग्रामीण और शहरी विकास में संतुलन बनाना होगा।

योगी आदित्यनाथ का कार्यकाल निवेश, धार्मिक आयोजनों और कानून-व्यवस्था में प्रगति के लिए सराहनीय है, लेकिन बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और पेंशन जैसे मुद्दों पर और ध्यान देने की जरूरत है। उनके बयानों और नीतियों में एक विशेष समुदाय को निशाना बनाने की प्रवृत्ति, साथ ही कुछ समुदायों के उग्र व्यवहार पर कार्रवाई की कमी, उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाती है। एक लोकतांत्रिक नेता को अपनी भाषा में संयम और सभी समुदायों के प्रति समान व्यवहार रखना चाहिए। उत्तर प्रदेश जैसे विविध राज्य में सामाजिक एकता और समावेशी विकास ही प्रगति का आधार हो सकता है

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