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योगी आदित्यनाथ का ‘वंदे मातरम’ बयान: हिंदुत्व की राजनीति या संवैधानिक उल्लंघन?
ज़की भारतीय
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 10 नवंबर 2025 को गोरखपुर में ‘एकता यात्रा’ और ‘वंदे मातरम’ सामूहिक गायन कार्यक्रम में एक विवादास्पद घोषणा की। उन्होंने कहा कि राज्य के सभी स्कूलों, कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों में राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य किया जाएगा। यह घोषणा सरदार वल्लभभाई पटेल की 150वीं जयंती और ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर की गई। योगी जी ने इसे राष्ट्रभक्ति और भारत माता के प्रति सम्मान जगाने का माध्यम बताया। लेकिन यह बयान सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक में आग की तरह फैल गया। कई लोग इसे हिंदुत्व की छवि चमकाने की राजनीतिक चाल बता रहे हैं।
योगी आदित्यनाथ का पूरा बयान क्या था?
योगी जी ने गोरखपुर में कहा,
राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के प्रति सम्मान का भाव होना चाहिए। हम उत्तर प्रदेश के हर विद्यालय, हर शिक्षण संस्थान में इसका गायन अनिवार्य करेंगे। इससे उत्तर प्रदेश के हर नागरिक के मन में भारत माता और मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और सम्मान का भाव जागृत होगा। वंदे मातरम का विरोध करने का कोई मतलब नहीं है। कोई धर्म या जाति देश से बड़ा नहीं हो सकता। जो लोग वंदे मातरम का विरोध करते हैं, वे देश की एकता और अखंडता का अपमान करते हैं। हमें उन ताकतों की पहचान करनी होगी जो राष्ट्रीय एकता को कमजोर करती हैं, ताकि आगे कोई नया जिन्ना न पैदा हो सके।
उन्होंने कांग्रेस पर भी निशाना साधा, आरोप लगाया कि कांग्रेस की तुष्टीकरण नीति ने 1947 में देश के विभाजन का कारण बना। उन्होंने 1923 के कांग्रेस अधिवेशन का जिक्र किया, जहां मोहम्मद अली जौहर ने वंदे मातरम शुरू होते ही सभा छोड़ दी थी। योगी जी ने कहा कि वंदे मातरम का विरोध भारत के विभाजन का दुर्भाग्यपूर्ण कारण रहा।
यह बयान कोई आकस्मिक नहीं लगता। योगी आदित्यनाथ एक समझदार और कुशल राजनीतिज्ञ हैं। बिहार चुनाव के दूसरे चरण में जहां सीमांचल और नेपाल बॉर्डर के इलाके मतदान कर रहे हैं, वहां हिंदू वोटों को एकजुट करने के लिए ऐसा बयान परफेक्ट टाइमिंग है। कट्टर हिंदुत्ववादी वोटरों में उनकी छवि और मजबूत करने का यह सुनहरा मौका है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह संवैधानिक रूप से सही है?
‘वंदे मातरम’ का पूरा गीत: मूल संस्कृत-बंगाली, हिंदी अनुवाद और विवादास्पद हिस्से
‘वंदे मातरम’ बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1875 में लिखा गया और 1882 में उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। यह स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बना। 1950 में संविधान सभा ने इसे राष्ट्रगीत का दर्जा दिया, लेकिन केवल पहले दो स्टैंजा को आधिकारिक माना। पूरा गीत संस्कृत और बंगाली में है। यहां मूल और सरल हिंदी अनुवाद:
मूल गीत (संस्कृत + बंगाली):
वन्दे मातरम्
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्
शस्यशामलां मातरम् ॥
वन्दे मातरम् ॥
शुभ्रज्योत्स्नां पुलकितयामिनीम्
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्
सुखदां वरदां मातरम् ॥
वन्दे मातरम् ॥
सप्तकोटि कण्ठ कलकलनिनादे
निनादे करकरे प्रणमति त्वां
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी
कमला कमलदलविहारिणी
वाणी विद्यादायिनी
नमामि त्वां
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम् ॥
वन्दे मातरम् ॥
स्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्
धरणीं भरणीं मातरम् ॥
वन्दे मातरम् ॥
सरल हिंदी अनुवाद:
मैं मातृभूमि को प्रणाम करता हूं। जल से भरपूर, फल देने वाली, मलय पर्वत की ठंडी हवा से शीतल, हरी-भरी फसलों वाली मां।
चांदनी से भरी रातें, फूलों से लदे पेड़, मीठी मुस्कान वाली, सुख और वरदान देने वाली मां।
सात करोड़ लोगों की गूंजती आवाज में तुझे प्रणाम। तू ही दुर्गा है दस हथियारों वाली, कमला (लक्ष्मी) कमल पर विहार करने वाली, वाणी (सरस्वती) विद्या देने वाली। मैं तुझे नमस्कार करता हूं।
सांवली, सरल, मुस्कुराती, धरती को पालने वाली मां।
विवाद क्यों? पहले दो स्टैंजा प्रकृति और देश की सुंदरता का वर्णन करते हैं, लेकिन तीसरे और चौथे में स्पष्ट हिंदू देवी-देवताओं का जिक्र: दुर्गा (शक्ति), लक्ष्मी (समृद्धि), सरस्वती (ज्ञान)। धरती को ‘माता’ कहना और प्रणाम करना इस्लाम के तौहीद (एकेश्वरवाद) से टकराता है, जहां केवल अल्लाह को सिजदा किया जाता है। मुसलमान धरती को अल्लाह की बनाई जमीन कहते हैं, माता नहीं। ‘सप्तकोटि’ (7 करोड़) अब पुराना हो चुका, अब 140 करोड़ लोग हैं। प्रकृति का वर्णन भी अब फिट नहीं बैठता – पेड़ कट रहे, फसलें बर्बाद हो रही।
संवैधानिक और कानूनी आपत्तियां: सुप्रीम कोर्ट के फैसले पहले भी रोक चुके हैं
भारत धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र है। संविधान की प्रस्तावना में ‘सेक्युलर’ शब्द है। अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता), 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और 14 (समानता) के तहत जबरदस्ती धार्मिक प्रतीक थोपना गलत है।
मुख्य केस: बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986)। तीन जहोवा विटनेस बच्चे राष्ट्रगान नहीं गाते थे क्योंकि उनकी धार्मिक मान्यता केवल ईश्वर को प्रणाम की इजाजत देती है। स्कूल ने निकाला, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा: “अगर ईमानदार धार्मिक वजह हो और व्यवस्था न बिगाड़े, तो जबरदस्ती नहीं।” बच्चों को वापस प्रवेश मिला। कोर्ट ने कहा राष्ट्रभक्ति जबरदस्ती नहीं सिखाई जाती। यही तर्क वंदे मातरम पर लागू होता है।
मद्रास हाईकोर्ट ने 2017 में तमिलनाडु में अनिवार्य किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में चुनौती लंबित। केरल, कर्नाटक में पहले रुक चुका। मुस्लिम संगठनों ने फतवे दिए कि यह शिर्क है।
बेहतर विकल्प: इकबाल का ‘सारे जहां से अच्छा’ – कोई देवी-देवता नहीं, ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’। हर धर्म का व्यक्ति गाता है।
राजनीतिक मकसद: बिहार चुनाव और हिंदुत्व की ब्रांडिंग
योगी जी समझदार नेता हैं। बिहार में दूसरे चरण में मुस्लिम बहुल इलाके वोटिंग कर रहे थे। जिन्ना का जिक्र कर हिंदू वोटरों को उकसाना क्लासिक BJP स्ट्रैटेजी। लेकिन यह देश को बांटता है। लोकतंत्र में जबरदस्ती नहीं, स्वेच्छा से राष्ट्रभक्ति आती है।
यह बयान असंवैधानिक है। PIL से इलाहाबाद हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट स्टे देगा। बिजो केस का हवाला देकर पूरा ऑर्डर रद्द हो सकता है। देश सर्वधर्म समभाव का है, न कि एक धर्म का। वंदे मातरम दिल से निकले, थोपकर नहीं। जय हिंद, जय संविधान!
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