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भारत-पाक तनाव पर अमेरिका के रुख और भूमिका पर सवाल,दोनों देशों से संयम की अपील या निष्पक्ष कार्रवाई की जरूरत?

ज़की भारतीय

लखनऊ, 10 मई। भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव पर व्हाइट हाउस ने 9 मई की रात एक बयान जारी कर दोनों देशों से “अधिकतम संयम” बरतने की अपील की। अमेरिकी विदेश मंत्रालय ने पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की, जिसमें 26 नागरिक मारे गए, और भारत के आतंकवाद-विरोधी प्रयासों का समर्थन किया। हालांकि, अमेरिका का यह सामान्य बयान कि “दोनों देश संयम बरतें” भारत में कई सवाल खड़े कर रहा है। क्या अमेरिका, जो भारत का रणनीतिक साझेदार है, को पाकिस्तान के खिलाफ सख्त रुख अपनाना चाहिए, या उसका तटस्थ बयान क्षेत्रीय स्थिरता के लिए जरूरी है?भारत और अमेरिका के बीच मजबूत कूटनीति और रक्षा साझेदारी ने हाल के वर्षों में दोनों देशों को करीब लाया है। अमेरिका ने भारत को हथियारों की आपूर्ति और खुफिया जानकारी साझा करके आतंकवाद-विरोधी अभियानों में सहयोग किया है। पहलगाम हमले, जिसके तार पाकिस्तान से जुड़े हैं, ने भारत के पर्यटन स्थलों की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। ऐसे में भारत को उम्मीद थी कि अमेरिका न केवल हमले की निंदा करेगा, बल्कि पाकिस्तान पर आतंकवाद को समर्थन बंद करने के लिए दबाव डालेगा। लेकिन व्हाइट हाउस का बयान दोनों पक्षों को समान रूप से संयम बरतने की सलाह देता है, जो कई भारतीयों को निराशाजनक लगता है।

अमेरिका का यह जुमला कि “दोनों देश संयम बरतें” अनुचित लगता है

पाकिस्तान का आतंकवाद को समर्थन लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय रहा है। जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा जैसे संगठन, जिनके ठिकाने ऑपरेशन सिंदूर में नष्ट किए गए, पाकिस्तान में खुले तौर पर काम करते हैं। संयुक्त राष्ट्र की 1267 समिति को भारत ने इन संगठनों के खिलाफ सबूत दिए, लेकिन पाकिस्तान ने दबाव डालकर कार्रवाई रोकी। ऐसे में अमेरिका का तटस्थ रुख इस सवाल को जन्म देता है कि क्या वह आतंकवाद के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई के लिए तैयार है?भारत का तर्क है कि आतंकवाद एक वैश्विक खतरा है, और इसे किसी एक देश के खिलाफ नहीं, बल्कि मानवता के खिलाफ युद्ध माना जाना चाहिए।

दोहरा मापदंड भारत जैसे सहयोगी देशों के लिए विश्वासघात जैसा

अमेरिका को चाहिए कि वह संयम की अपील के बजाय एक अंतरराष्ट्रीय फौज का गठन करे, जो आतंकवादियों के खिलाफ निष्पक्ष जांच करे और दोषियों को गिरफ्तार कर सजा दे। ऐसी फौज में संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में भारत, अमेरिका, रूस, और अन्य देश शामिल हो सकते हैं। यह फौज पाकिस्तान जैसे देशों पर दबाव डाल सकती है कि वे आतंकी ठिकानों को नष्ट करें और उनके वित्तपोषण को रोकें।अमेरिका के लिए यह जुमला कि “दोनों देश संयम बरतें” इसलिए भी अनुचित लगता है, क्योंकि भारत आतंकवाद का शिकार है, जबकि पाकिस्तान उसका समर्थक रहा है। अमेरिका ने अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ कार्रवाई की, लेकिन पाकिस्तान के मामले में उसका रुख नरम रहा है। यह दोहरा मापदंड भारत जैसे सहयोगी देशों के लिए विश्वासघात जैसा है।हालांकि, अमेरिका की स्थिति जटिल है। वह पाकिस्तान को अफगानिस्तान में स्थिरता के लिए एक साझेदार मानता है, और उस पर पूरी तरह दबाव डालना क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ा सकता है। फिर भी, भारत का मानना है कि आतंकवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई के बिना शांति संभव नहीं है। अमेरिका को चाहिए कि वह भारत के साथ खुलकर खड़ा हो और वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराए। केवल संयम की अपील से न तो आतंकवाद रुकेगा, न ही भारत जैसे देशों का भरोसा बरकरार रहेगा।

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