HomeArticleटीपू सुल्तान पर हिंदू विरोधी होने का आरोप सही या ग़लत

टीपू सुल्तान पर हिंदू विरोधी होने का आरोप सही या ग़लत

ज़की भारतीय ✍🏼

आज फेसबुक पर एक मुख्यमंत्री की पोस्ट पढ़ी जिसमें टीपू सुल्तान पर हिंदू विरोधी होने का आरोप लगाया गया था, खासकर मालाबार (केरल के उत्तरी हिस्से) और कोडागु के अभियानों का हवाला देकर। वे दावा किया गया था कि वहां 50 से 70 हजार (या कभी-कभी 75 हजार) हिंदुओं को सजा दी गई, जबरन धर्मांतरण करवाया गया, या हत्याएं की गई। ये आरोप पढ़ने के बाद रहा नहीं गया और सोचा,एक बार फिर सत्यता पर आधारित एक लेख लिखकर भ्रांति को दूर किया जाए। आप पढ़ेंगे या नहीं ? इस सत्यता को साझा करेंगे या नहीं ? ये तो नहीं पता लेकिन ये ये बताते चलें कि टीपू सुल्तान पर ये आरोप और आंकड़े अतिरंजित और कई बार फर्जी या बिना ठोस आधार के हैं ।
कई इतिहासकार इन्हें ब्रिटिश प्रोपेगैंडा मानते हैं, जो टीपू को बदनाम करने के लिए फैलाए गए थे, क्योंकि वे ब्रिटिश के सबसे बड़े दुश्मन थे।
उस समय के राजा-महाराजा क्षेत्र विस्तार के लिए एक-दूसरे पर हमला करते थे—ये आम बात थी। टीपू ने भी यही किया। जहां उन्होंने आक्रमण किए (मालाबार, कोडागु आदि), वहां स्थानीय विरोध था—विद्रोह, विदेशी गठबंधन (ब्रिटिश या अन्य के साथ), या क्षेत्रीय शक्ति संघर्ष।
वहां बहुमत हिंदू थे (नायर, कोडावा आदि योद्धा समुदाय), इसलिए युद्ध में मरने वाले या प्रभावित ज्यादातर हिंदू ही हुए। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि टीपू ने खास तौर पर हिंदुओं पर धार्मिक अत्याचार किए—ये शासन विस्तार और सैन्य कार्रवाई की बात थी।
विरोधी (चाहे हिंदू हों या मुसलमान) को दबाया जाता था। उस युग में मराठा, सिख, राजपूत आदि भी पड़ोसियों पर हमला करते थे, और हारने वाले को सजा मिलती थी।

जबकि टीपू के अपने मैसूर राज्य (श्रीरंगपट्टनम केंद्रित) में पूरी तरह अलग तस्वीर है—वहां उन्होंने हिंदुओं के साथ सहिष्णुता और सहयोग दिखाया, जो उनके अच्छे शासक होने का प्रमाण है।

हिंदू अधिकारियों की नियुक्ति

टीपू की प्रशासन में कई उच्च पदों पर हिंदू (खासकर ब्राह्मण) थे। उनके प्रमुख मंत्री और सलाहकार ऊपरी जाति के हिंदू थे, जैसे पूर्णैया (Purnaiah) आदि।

मंदिरों को अनुदान और संरक्षण — 1782 से 1799 तक, टीपू ने 156 हिंदू मंदिरों को नियमित अनुदान दिए—भूमि, सोना-चांदी के बर्तन, गहने, नकद और गांव। उन्होंने 34 “सनद” (endowment deeds) जारी किए।

श्रीरंगपट्टनम का रंगनाथस्वामी मंदिर — विशेष संरक्षण मिला, पूजा-पाठ जारी रही, टीपू ने दान दिए और यहां ज्योतिषियों से सलाह ली।

श्रृंगेरी मठ सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है

मराठा हमले के बाद टीपू ने शंकराचार्य को “जगतगुरु” कहकर संबोधित किया, आशीर्वाद मांगा, 200 फनम नकद, अनाज, कपड़े, मंदिर सजावट भेजी, मरम्मत करवाई।

अन्य मंदिर

नंजनगुड (लक्ष्मीकांत और श्रीकंठेश्वर), मेलकोटे (नारायण स्वामी), कांची, और कई अन्य। दशहरा उत्सव में भाग लिया, मंदिरों को दान दिए।

सेना में हिंदुओं की भागीदारी

टीपू की सेना में हिंदू सैनिकों की अच्छी संख्या थी—कुछ स्रोतों में 65% से ज्यादा हिंदू बताए जाते हैं। उनके रॉकेट आर्टिलरी और अन्य इकाइयों में हिंदू योद्धा शामिल थे।

धार्मिक सहिष्णुता

हिंदू ज्योतिषियों से सलाह ली, रीति-रिवाज किए। उनके राज्य में हिंदू पूजा-पाठ जारी रही, मंदिरों में दैनिक पूजा होती थी। इतिहासकार जैसे इरफान हबीब, मोहिब्बुल हसन आदि उन्हें हिंदू धर्म के रक्षक कहते हैं।
ये सबूत मैसूर गजेटियर, मंदिर अभिलेख, टीपू के पत्र (Sringeri letters), और कई आधुनिक अध्ययनों से आते हैं। टीपू खुद धार्मिक मुसलमान थे, लेकिन अपने राज्य में हिंदुओं को दबाने की बजाय सहयोग लिया—क्योंकि हिंदू बहुमत थे और ब्रिटिश से लड़ाई के लिए एकजुटता जरूरी थी।

टीपू ब्रिटिश के खिलाफ बहादुर लड़ाकू थे—रॉकेट तकनीक pioneer, अंत तक लड़े। वो एक अच्छे भारतीय थे जो विदेशी आक्रमणकारियों से लड़े। उनकी अच्छाइयां (मंदिर संरक्षण, हिंदू भागीदारी, प्रशासन सुधार) दिखाती हैं कि वो सभी के शासक बनने की कोशिश कर रहे थे।
इतिहास जटिल है—न तो पूरी तरह अच्छा, न बुरा। लेकिन अच्छी बातों पर फोकस करें: टीपू अच्छे शासक और ब्रिटिश विरोधी योद्धा थे। आरोपों को संदर्भ में देखें—कई ब्रिटिश स्रोतों से आते हैं, जो उन्हें बदनाम करना चाहते थे।

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