ज़की भारतीय
ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव आज के दौर में एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है। आज, 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले किए, जिनमें तेहरान सहित कई शहरों में विस्फोट हुए। इन हमलों का मुख्य उद्देश्य ईरान के सैन्य ठिकानों, मिसाइल कार्यक्रम और परमाणु सुविधाओं को नष्ट करना बताया गया है, साथ ही ट्रंप प्रशासन ने ईरान में शासन परिवर्तन की अपील भी की। ईरान ने तुरंत पलटवार किया, जिसमें इजरायल पर मिसाइल दागे गए और खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य अड्डों (जैसे कतर, बहरीन, यूएई और कुवैत में) पर हमले किए गए। यह घटना मध्य पूर्व में बड़े युद्ध की आशंका को बढ़ा रही है और दुनिया भर में चिंता का विषय बनी हुई है।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिका और इजरायल की आपत्ति के पीछे कारण
ईरान का परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से विवाद का केंद्र रहा है। ईरान का दावा है कि यह कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों (जैसे ऊर्जा उत्पादन और चिकित्सा) के लिए है, और उसके पास परमाणु हथियार विकसित करने का कोई इरादा नहीं है। लेकिन अमेरिका और इजरायल इसे खतरे के रूप में देखते हैं। मुख्य कारण यह है कि ईरान उच्च स्तर पर यूरेनियम संवर्धन (enrichment) कर रहा है, जो हथियार-ग्रेड यूरेनियम बनाने की दिशा में एक कदम माना जाता है। इजरायल के लिए यह अस्तित्व का सवाल है, क्योंकि वह खुद परमाणु संपन्न देश है और ईरान को परमाणु हथियार वाला पड़ोसी नहीं चाहता।
अमेरिका का तर्क है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम से क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ेगी, और उसके प्रॉक्सी ग्रुप्स (जैसे हिजबुल्लाह, हूती) को मजबूती मिलेगी। हालांकि, ईरान का कहना है कि पाकिस्तान और भारत जैसे देशों ने परमाणु हथियार बनाए और उन्हें कोई प्रतिबंध नहीं झेलना पड़ा। ईरान के अनुसार, यह उसके राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है, खासकर इजरायल और अमेरिका के लगातार खतरे के बीच। लेकिन अमेरिका और इजरायल इसे बहाना मानते हैं और मानते हैं कि ईरान का असली मकसद क्षेत्रीय वर्चस्व और इजरायल को नष्ट करना है।
यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि परमाणु हथियार प्राप्त करने वाला ईरान मध्य पूर्व की शक्ति संतुलन बदल सकता है। लेकिन ईरान का तर्क मजबूत है कि NPT (Non-Proliferation Treaty) के तहत उसे शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा का अधिकार है, और प्रतिबंध अन्यायपूर्ण हैं।
ईरान की राजनीतिक व्यवस्था और अमेरिका का विरोध
1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में शाह मोहम्मद रजा पहलवी की सत्ता समाप्त हुई और आयतुल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में इस्लामिक गणराज्य स्थापित हुआ। वर्तमान में सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खमेनेई हैं, जो राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री नहीं हैं, बल्कि सर्वोच्च धार्मिक और राजनीतिक अधिकारी हैं। ईरान में राष्ट्रपति चुने जाते हैं, लेकिन अंतिम फैसला सुप्रीम लीडर का होता है।
अमेरिका ईरान की इस व्यवस्था को हज़म नहीं कर पा रहा है और आरोप लगाता है कि ईरान दुनिया भर के मुसलमानों को एकजुट करने के नाम पर आतंकवाद को बढ़ावा देता है। जबकि ईरान आतंकवाद के विरुद्ध पहले से ही काम कर रहा है। ईरान का मकसद पैन-इस्लामिक एकता है, लेकिन अमेरिका इसे बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। अमेरिका इसे क्षेत्रीय अस्थिरता का कारण मानता है। ईरान ने फिलिस्तीन, लेबनान और यमन जैसे क्षेत्रों में मदद की है, जिसे अमेरिका और इजरायल आतंकवाद समर्थन कहते हैं।
अमेरिका ने इतिहास में कई मुस्लिम देशों (जैसे अफगानिस्तान, इराक) में हस्तक्षेप किया, जहां उसने आतंकवाद के बहाने कब्जा किया और संसाधनों (तेल, यूरेनियम) पर नियंत्रण स्थापित किया। ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादियों को पहले अमेरिका ने समर्थन दिया था, फिर बाद में हमला किया। ईरान का मानना है कि अमेरिका मुस्लिम देशों में अपनी एकाधिकार (monopoly) बनाना चाहता है और ईरान इसका विरोध करता है।
वर्तमान हमले और पलटवार की स्थिति
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बड़े हमले किए, जिसमें तेहरान में विस्फोट हुए और कई नेताओं को निशाना बनाया गया। ट्रंप ने इसे “major combat operations” कहा और ईरानियों से शासन बदलने की अपील की। ईरान ने जवाब में इजरायल पर मिसाइल दागे और अमेरिकी बेस (अल उदैद कतर, बहरीन की 5th फ्लीट आदि) पर हमले किए। कई खाड़ी देशों में विस्फोट हुए, लेकिन बड़े नुकसान की खबरें सीमित हैं।
ईरान ने अकेले ही पलटवार किया, हालांकि रूस जैसे सहयोगी समर्थन दे रहे हैं। यह दिखाता है कि ईरान अपनी संप्रभुता के लिए डटा हुआ है।
भारत का रुख और तुलना
भारत और ईरान के बीच मजबूत संबंध हैं। ईरान भारत का महत्वपूर्ण तेल साझेदार रहा है और चाबहार पोर्ट जैसे प्रोजेक्ट्स में सहयोग है। लेकिन भारत अमेरिका के साथ भी मजबूत रिश्ते रखता है। हाल के वर्षों में अमेरिका ने भारत पर टैरिफ बढ़ाए, लेकिन भारत चुप रहा। ट्रंप ने भारत-पाकिस्तान सीजफायर का क्रेडिट लिया, जबकि भारत ने इसे पाकिस्तान की रिक्वेस्ट बताया।
चीन के साथ बॉर्डर विवाद में भी भारत मजबूत रुख नहीं दिखा पाया। राहुल गांधी जैसे विपक्षी नेताओं ने इसे कमजोरी बताया। ईरान की तरह भारत अमेरिका या इसराइल से संबंध खराब नहीं करना चाहता है,इसीलिए भारत पर टैरिफ बढ़ाए जाने के बाद भी भारत की ओर से उचित जवाब नहीं दिया गया।
लेकिन ईरान ने दिखाया कि छोटा देश भी मजबूत इच्छाशक्ति से टिक सकता है।
ईरान की चुनौती और विश्व युद्ध की आशंका
ईरान का संघर्ष अमेरिका और इजरायल की गुंडागर्दी के खिलाफ है। अमेरिका दुनिया को अपनी मर्जी से चलाना चाहता है, जबकि ईरान अपनी स्वतंत्रता और मुस्लिम एकता के लिए लड़ रहा है। यह जंग अगर बढ़ी तो थर्ड वर्ल्ड वॉर में बदल सकती है।
ईरान ने साबित किया कि जीत-हार से ज्यादा महत्वपूर्ण है उद्देश्य पर अटल रहना। मरने के बाद भी अगर उद्देश्य जीवित रहा, तो वह जीत है। ईरान झुका नहीं और उम्मीद है कि नहीं झुकेगा।



