ज़की भारतीय
लखनऊ,17 जून। इज़राइल और ईरान के बीच चल रहा युद्ध आज अपने पांचवें दिन में प्रवेश कर चुका है। इस युद्ध ने मध्य-पूर्व में तनाव को चरम पर पहुंचा दिया है, और इसके प्रभाव वैश्विक स्तर पर महसूस किए जा रहे हैं। खबरों के अनुसार, इस युद्ध में ईरान में 230 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि इज़राइल में मृतकों की संख्या 24 बताई जा रही है। इन आंकड़ों ने कई सवाल खड़े किए हैं, खासकर तब जब दोनों पक्षों के हमलों की प्रकृति और उनके निशाने पर सवाल उठ रहे हैं। इस बीच, तेहरान में भारतीय दूतावास ने ईरान में रह रहे 93 भारतीय नागरिकों के लिए एक महत्वपूर्ण एडवाइज़री जारी की है, जिसमें उन्हें सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी गई है। यह लेख इस युद्ध की पृष्ठभूमि, भारतीय दूतावास की भूमिका, और मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए एक संतुलित विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
युद्ध की पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति
इज़राइल और ईरान के बीच तनाव कोई नई बात नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में यह खुले युद्ध का रूप ले चुका है। इज़राइल ने ‘ऑपरेशन राइज़िंग लायन’ के तहत ईरान के परमाणु ठिकानों, सैन्य अड्डों, तेल डिपो, और खुफिया केंद्रों पर हमले किए हैं। इज़राइल का दावा है कि ये हमले ईरान की परमाणु क्षमता को कम करने के लिए आवश्यक थे। दूसरी ओर, ईरान ने जवाबी कार्रवाई में इज़राइल पर 150-200 मिसाइलें दागी हैं, जिनमें सैन्य और कथित तौर पर नागरिक ठिकाने भी शामिल हैं।हालांकि, मृतकों के आंकड़े एक असंतुलन दिखाते हैं। ईरान में 230 से अधिक मौतें, जिनमें सैन्य और नागरिक दोनों शामिल हो सकते हैं, इज़राइल के 24 मृतकों की तुलना में काफी अधिक हैं। यह सवाल उठता है कि क्या ईरान वास्तव में नागरिक ठिकानों पर हमले कर रहा है, जैसा कि कुछ भारतीय मीडिया चैनल दावा कर रहे हैं। यदि ईरान नागरिक ठिकानों को निशाना बना रहा होता, तो इज़राइल में मृतकों की संख्या संभवतः अधिक होती। वहीं, इज़राइल के हमले यदि केवल सैन्य और परमाणु ठिकानों तक सीमित हैं, तो ईरान में इतनी बड़ी संख्या में मौतें कैसे हुईं? यह असंतुलन और खबरों की प्रस्तुति में पक्षपात की ओर इशारा करता है।
भारतीय दूतावास की एडवाइज़री पर उठ रहे हैं सवाल
तेहरान में भारतीय दूतावास ने ईरान में रह रहे 93 भारतीय नागरिकों के लिए एक ताज़ा एडवाइज़री जारी की है। इस एडवाइज़री में भारतीय नागरिकों और भारतीय मूल के लोगों से अनुरोध किया गया है कि वे “अपने साधनों का उपयोग करके” तेहरान छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर चले जाएं। दूतावास ने इसके लिए कई आपातकालीन संपर्क नंबर भी जारी किए हैं, जिनमें कॉल के लिए: +98 9128109115, +98 9128109109 व्हाट्सएप के लिए: +98 901044557, +98 9015993320, +91 8086871709 बंदर अब्बास: +98 9177699036 ज़ाहेदान: +98 9396356649 दूतावास ने भारतीय नागरिकों से अनावश्यक गतिविधियों से बचने और स्थानीय प्रशासन के सुरक्षा निर्देशों का पालन करने की सलाह दी है।इसके अलावा, एक टेलीग्राम लिंक (https://t.me/indiansiniran) भी जारी किया गया है, जिसके ज़रिए ईरान में रह रहे भारतीय अपडेट प्राप्त कर सकते हैं।
हालांकि, इस एडवाइज़री पर सवाल उठ रहे हैं। ईरान में भारतीय नागरिक, जिनमें ज़्यादातर छात्र और तीर्थयात्री शामिल हैं, भाषा की समस्या का सामना कर सकते हैं, क्योंकि वहां फारसी बोली जाती है, और ज़्यादातर भारतीय नागरिक हिंदी, उर्दू, या अंग्रेजी बोलते हैं। ऐसे में, “अपने साधनों” से सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह अव्यवहारिक लगती है। कई लोगों का मानना है कि भारत सरकार को ईरान और इज़राइल दोनों से समन्वय करके भारतीय नागरिकों की सुरक्षित निकासी के लिए विशेष उड़ानें या अन्य व्यवस्थाएं करनी चाहिए।
भारत की कूटनीतिक स्थिति
भारत का इज़राइल और ईरान दोनों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध रहा है। भारत ने हमेशा शांति और कूटनीति का समर्थन किया है, चाहे वह रूस-यूक्रेन युद्ध हो या हमास-इज़राइल संघर्ष। इस युद्ध में भी भारत ने दोनों देशों से तनाव कम करने और संयम बरतने की अपील की है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री से बातचीत में नागरिकों की सुरक्षा पर जोर दिया, जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से बात कर शांति की आवश्यकता पर बल दिया।भारत की यह संतुलित कूटनीति वैश्विक मंच पर उसकी बढ़ती ताकत को दर्शाती है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युद्ध का दायरा बढ़ता है, तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक हित प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि मध्य-पूर्व वैश्विक तेल उत्पादन का एक तिहाई हिस्सा आपूर्ति करता है। हाल में तेल की कीमतों में 13% की वृद्धि इसका संकेत है।
मीडिया की निष्पक्षता पर सवाल
इस युद्ध को लेकर भारतीय मीडिया की कुछ रिपोर्ट्स पर पक्षपात का आरोप लग रहा है। कुछ चैनलों ने दावा किया कि इज़राइल ने तेहरान पर “कब्जा” कर लिया है, जो पूरी तरह आधारहीन है, क्योंकि यह युद्ध हवाई और मिसाइल हमलों तक सीमित है। ऐसी खबरें न केवल गलत सूचना फैलाती हैं, बल्कि जनता में भ्रांति भी पैदा करती हैं। एक सच्चे पत्रकार का कर्तव्य है कि वह तथ्यों को दर्पण की तरह प्रस्तुत करे, न कि किसी एक पक्ष का समर्थन करे।उदाहरण के लिए, कुछ मीडिया आउटलेट्स ने ईरान को “नागरिक ठिकानों” पर हमले करने का दोषी ठहराया, जबकि इज़राइल के हमलों को “रणनीतिक” बताया। यह असंतुलन तब और स्पष्ट होता है जब मृतकों के आंकड़ों की तुलना की जाती है। यदि इज़राइल केवल सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहा है, तो ईरान में 230 मौतें कैसे हुईं? और यदि ईरान नागरिक ठिकानों पर हमला कर रहा है, तो इज़राइल में मृतकों की संख्या केवल 24 क्यों है? यह स्पष्ट करता है कि कुछ खबरें पक्षपातपूर्ण तरीके से लिखी जा रही हैं।
इज़राइल-फिलिस्तीन का ऐतिहासिक संदर्भ
इस युद्ध को समझने के लिए इज़राइल और फिलिस्तीन के बीच ऐतिहासिक विवाद को समझना ज़रूरी है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद, जब ओटोमन साम्राज्य की हार हुई, ब्रिटेन ने फिलिस्तीन पर नियंत्रण हासिल किया। उस समय वहां अरब बहुसंख्यक और यहूदी अल्पसंख्यक थे। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ब्रिटेन को यहूदी मातृभूमि बनाने का ज़िम्मा सौंपा, जिससे तनाव बढ़ा। 1920 और 1940 के दशक में, यूरोप में नाज़ी उत्पीड़न से भागकर यहूदी आप्रवासियों की संख्या में वृद्धि हुई।1948 में इज़राइल के गठन के बाद, फिलिस्तीनियों और यहूदियों के बीच संघर्ष और गहरा गया। कई फिलिस्तीनी इसे “नकबा” (विनाश) के रूप में याद करते हैं, जब लाखों लोग विस्थापित हुए। आज, इज़राइल की नीतियों, खासकर गाजा और वेस्ट बैंक में, को लेकर वैश्विक स्तर पर आलोचना होती है। कुछ लोग तर्क देते हैं कि इज़राइल, जिसे कभी हिटलर के अत्याचारों से बचने के लिए शरण मिली थी, अब वही दमनकारी नीतियां अपना रहा है, जिनका वह स्वयं शिकार रहा था।
इज़राइल और ईरान के बीच युद्ध न केवल मध्य-पूर्व, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए खतरा है। भारत, जो दोनों देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध रखता है, इस संकट में शांति की वकालत कर रहा है। भारतीय दूतावास की एडवाइज़री एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसे और प्रभावी बनाने के लिए ठोस निकासी योजनाओं की ज़रूरत है। साथ ही, भारतीय मीडिया को निष्पक्ष पत्रकारिता का पालन करना चाहिए और ऐसी खबरों से बचना चाहिए जो किसी एक पक्ष का समर्थन करती हों।इस युद्ध का कोई आसान अंत नज़र नहीं आ रहा है, और मृतकों की संख्या बढ़ने की आशंका बनी हुई है। भारत को अपनी कूटनीतिक ताकत का उपयोग करके न केवल अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए, बल्कि क्षेत्र में शांति स्थापना में भी योगदान देना चाहिए। पत्रकारिता का धर्म है सत्य को सामने लाना, और यह तभी संभव है जब खबरें निष्पक्ष और तथ्यपरक हों।




