ज़की भारतीय
अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए बड़े हमलों ने पूरे गल्फ क्षेत्र को युद्ध की आग में झोंक दिया। इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की शहादत हुई। ईरानी राज्य मीडिया ने उनकी मौत की पुष्टि की, और इसके बाद ईरान ने पलटवार में गल्फ देशों—बहरीन, यूएई (दुबई सहित), कुवैत, सऊदी अरब, कतर—में अमेरिकी सैन्य अड्डों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए। ये हमले इतने प्रभावी थे कि बहरीन में अमेरिकी नौसेना के पांचवें फ्लीट मुख्यालय को नुकसान पहुंचा, दुबई में बंदरगाह और आसपास के इलाकों में आग लगी, और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था ठप हो गई।
ईरान ने इन हमलों से साबित किया कि वह न झुकेगा और न ही कमजोर पड़ेगा। लेकिन सवाल यह उठता है,आयतुल्लाह खामेनेई को निशाना बनाने की क्या जरूरत थी?
सोशल मीडिया पर लाखों लोग यही पूछ रहे हैं। जवाब इतिहास और राजनीति में छिपा है। खामेनेई पिछले तीन दशकों से ईरान के सर्वोच्च नेता थे। उन्होंने शिया-सुन्नी एकता पर जोर दिया, मुस्लिम देशों को एकजुट होने का आह्वान किया, और फिलिस्तीन मुद्दे पर मजबूत आवाज उठाई। “भाई-भाई” का नारा उनके लिए सिर्फ शब्द नहीं था, बल्कि कुरान और अहले बैत तथा रसूलुल्लाह (सल्ल.) की सीरत के अनुसार सच्ची एकता का संदेश था। यह नारा इस्लाम के मूल सिद्धांतों पर आधारित था—जो भेदभाव मिटाकर मुसलमानों को एक सूत्र में बांधने की कोशिश करता था। लेकिन यही एकता का प्रयास इजरायल और अमेरिका को खटकता था, क्योंकि इससे मुस्लिम दुनिया मजबूत हो सकती थी। परिणामस्वरूप, उन्हें शहादत का जाम पीना पड़ा।
शहादत के बाद ईरान की जनता और सेना ने एकजुट होकर पलटवार किया। हमलों के बाद तेहरान और अन्य शहरों में शोक सभाएं हुईं, और राष्ट्रव्यापी एकता दिखी। ईरान ने अपनी मजबूती साबित की, लेकिन धोखे की कहानी पुरानी है। जिनके लिए खामेनेई एकता की बात करते थे, वही गल्फ के कई देश अमेरिका-इजरायल का साथ देकर ईरान के खिलाफ खड़े हो गए। सऊदी अरब, यूएई, बहरीन—ये वही देश हैं जिनके लिए एकता का नारा दिया जाता था। लेकिन उन्होंने विदेशी हितों के आगे झुककर धोखा दिया। यह धोखा मुस्लिम इतिहास में बार-बार दोहराया गया है, जहां “ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” कहने वाले ही बगावत कर बैठे।
पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) के समय से यह सिलसिला चला आ रहा है। पैगंबर के बाद खलीफा के चुनाव में कई मुसलमानों ने हजरत अली (र.अ.) के अधिकार का विरोध किया। सिफ्फीन की जंग में मुआविया ने हजरत अली के खिलाफ बगावत की, और विलायत-ए-रसूल का हक छीन लिया। फिर करबला आया—इमाम हुसैन (र.अ.) के खिलाफ यज़ीद की फौज में भी मुसलमान ही थे। ये वही लोग थे जो कलमा पढ़ते थे, लेकिन सत्ता और स्वार्थ के लिए इमाम की शहादत का कारण बने। इतिहास गवाह है कि तथाकथित मुसलमानों ने बार-बार इस्लाम के सच्चे वारिसों के खिलाफ खड़े होकर धोखा दिया।
आज भी यही कहानी दोहराई जा रही है। खामेनेई ने शिया-सुन्नी एकता के लिए प्रयास किए, फिलिस्तीन के लिए आवाज उठाई, लेकिन गल्फ के कई देशों ने अमेरिका के साथ मिलकर ईरान को धोखा दिया। भारत में भी प्रतिक्रिया देखी गई—शिया समुदाय ने बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शन किए, कुछ जगहों पर सुन्नी भाई भी शामिल हुए। लेकिन यह पूर्ण शिया-सुन्नी एकता नहीं कहलाती। भारत जैसे देश में, जहां फिलिस्तीन के अत्याचारों के खिलाफ मुस्लिम आवाज उठाते हैं, फिर भी कुछ जुलूसों में “पाकिस्तान जिंदाबाद” के नारे लगते हैं। यह बदनामी का कारण बनता है।
इस्लाम का मूल संदेश क्या है? कुरान में साफ कहा गया है—”ला इक्राह फिद्दीन” (दीन में कोई जबरदस्ती नहीं)। इस्लाम तलवार से नहीं, बल्कि प्यार, मोहब्बत से फैला। पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) की सीरत इसका जीता-जागता प्रमाण है। लोग उनकी सच्चाई, दया और न्याय देखकर इस्लाम कबूल करते थे, न कि जंग या तलवार से। लेकिन कुछ लोग आज भी तलवार और जिहाद के नाम पर हिंसा फैलाते हैं, जिससे इस्लाम बदनाम होता है। ऐसे तथाकथित मुसलमानों की वजह से आम मुसलमान बदनाम होता है—चाहे भारत में हो या कहीं और।
खामेनेई की शहादत ने एक बार फिर साबित किया कि मुस्लिम दुनिया में एकता का नारा कितना खोखला हो सकता है, जब स्वार्थ हावी हो जाए। जिनके लिए उन्होंने जीवन समर्पित किया, वही उनके खिलाफ खड़े हो गए। इतिहास दोहराया जा रहा है—पैगंबर से लेकर इमाम हुसैन, और अब खामेनेई तक। लेकिन सच्चाई यह है कि इस्लाम का असली चेहरा शांति और एकता है, न कि धोखा और बगावत।
आज जरूरत है कि मुसलमान अपने इतिहास से सबक लें। तथाकथित एकता की बातें छोड़कर असली एकता पर ध्यान दें—जो कुरान और सुन्नत पर आधारित हो। स्वार्थ, सत्ता और विदेशी हितों के आगे झुकना बंद करें। अन्यथा, शहादतें व्यर्थ होती रहेंगी, और इस्लाम के दुश्मन मजबूत होते जाएंगे।



