ज़की भारतीय
आज हम एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं जहाँ आयतुल्लाह अली खामनेई की शहादत ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हमलों में तेहरान में अपने घर में 86 वर्षीय ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता आयतुल्लाह खामनेई शहीद हो गए। ईरानी राज्य मीडिया ने इसकी पुष्टि की है और 40 दिनों का शोक मनाने की घोषणा की गई है। यह घटना न केवल ईरान के लिए, बल्कि पूरी मुस्लिम दुनिया के लिए एक बड़ा सदमा है।
क्या इज़राइल और अमेरिका सोचते हैं कि आयतुल्लाह खामनेई की शहादत के बाद वे इस्लाम को खत्म कर देंगे? क्या वे मानते हैं कि अब ईरान में कोई उत्तराधिकारी नहीं होगा और आयतुल्लाह का सिलसिला खत्म हो जाएगा? बिल्कुल नहीं! इतिहास गवाह है कि इस्लाम के रास्ते में आने वाली हर ताकत को शहीदों की लहू से और मजबूती मिली है। आयतुल्लाह खामनेई की शहादत से पहले भी उन्होंने एक वीडियो जारी किया था जिसमें उन्होंने कहा था, “मैं 86 साल का हो चुका हूँ। मौत तो मुझे वैसे भी आनी है। मरना तो है ही। कुल्लु नफ्सिन ज़ाइकतुल मौत (हर जान को मौत का स्वाद चखना है)। लेकिन इज्जत की मौत ज़िल्लत की जिंदगी से बेहतर है।” यह बातें उन्होंने उन लाखों धमकियों के बावजूद कहीं जो अमेरिका और इज़राइल से आ रही थीं। उन्होंने कभी अमेरिका को सुपरपावर नहीं माना, बल्कि अल्लाह को ही सर्वशक्तिमान कहा।
लोग उनकी इस हिम्मत को सलाम कर रहे हैं। युद्ध के दौरान आम लोग बंकरों में छिपते हैं, देश छोड़कर भागते हैं, दूसरे मुल्कों में शरण लेते हैं। लेकिन आयतुल्लाह खामनेई न झुके, न भागे। वे अपने घर में बैठे रहे, अल्लाह पर भरोसा रखा और शहीद हो गए। उनकी यह बहादुरी दुनिया देख रही है। आज पाकिस्तान, भारत, इराक, लेबनान, यमन से लेकर दुनिया भर के मुस्लिम देशों में लोग सड़कों पर “अमेरिका मुर्दाबाद, इज़राइल मुर्दाबाद” के नारे लगा रहे हैं। लोग आँसू बहा रहे हैं, अपने रहबर के बिछड़ने पर रो रहे हैं। यह शहादत की असली सफलता है – जिंदा रहते लोग मिलने की तमन्ना करें और मरने के बाद लोग याद करके रोएँ।
ईरान से अमेरिका और इज़राइल की दुश्मनी आखिर क्यों है? क्या आयतुल्लाह खामनेई ने कभी इज़राइल पर इस्लामी हुकूमत थोपने की कोशिश की? नहीं। उन्होंने कोई ऐसा फतवा नहीं दिया जिससे इज़राइल पर हमला हो। फिर भी अमेरिका ने वर्षों से ईरान पर परमाणु बम के बहाने पाबंदियाँ लगाईं, अर्थव्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश की। असल वजह यह है कि ईरान एक शिया देश है जो मुसलमानों को एकजुट करने की कोशिश कर रहा था। अमेरिका और इज़राइल, जो यहूदियों के इशारे पर चलते हैं, कभी नहीं चाहते कि मुसलमान एक हों। उनकी नीति है – डिवाइड एंड रूल। मुसलमानों को बाँटो, उन पर हुकूमत करो।
आज ईरान को 8 मुस्लिम देशों पर हमले करने पड़े, जो अमेरिका के साइलेंट ठिकानों पर थे। वे मुस्लिम देश थे, यहूदी या ईसाई नहीं। लेकिन जो नेता सत्ता के साथ रहते हुए भी अत्याचार के आगे नहीं झुकते, वे ही इतिहास में याद किए जाते हैं। इसकी बुनियाद हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने करबला में डाली थी। यजीद जैसे ज़ालिम शासक के सामने बड़े-बड़े झुक गए थे, लेकिन इमाम हुसैन और उनके 71 साथियों ने शर्तों से इनकार किया, जंग लड़ी और शहीद हो गए। उनके घरवालों पर अत्याचार हुए, लेकिन उन्होंने कभी सर नहीं झुकाया। आज भी शिया समुदाय में इमाम हुसैन की सीरत नज़र में रहती है।
आयतुल्लाह खामनेई और उनसे पहले आयतुल्लाह खुमैनी ने भी अमेरिका-इज़राइल से कोई समझौता नहीं किया। ईरान पर पाबंदियाँ लगाना, सोशल मीडिया और गोदी मीडिया के जरिए करोड़ों-अरबों खर्च कर बदनाम करना – यह सब यहूदियों का प्रोग्राम है जिसमें कई देश शामिल हैं। सवाल यह है कि जब ईरान की पॉलिसी से इज़राइल-अमेरिका का कोई सरोकार नहीं, तो उन्हें ईरान को जीने क्यों नहीं देते? मामला सिर्फ इतना है कि 1979 में ईरान में तख्तापलट हुआ, शाह का शासन खत्म हुआ और धार्मिक नेता सत्ता में आए। वे मंत्री या प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि धार्मिक सर्वोच्च नेता हैं। ईरान की जनता इस्लाम के अनुयायी है और इस्लामी कानूनों से उन्हें कोई आपत्ति नहीं।
हिजाब के नाम पर सोशल मीडिया में ईरान को बदनाम किया जाता है, जबकि ईरानी महिलाओं को बराबरी का दर्जा है। वे कार्यालयों में पुरुषों के साथ काम करती हैं, एयर फोर्स, डिफेंस, मिलिट्री में उनकी भागीदारी है। यह सब दिखाता है कि ईरान पर आरोप बेबुनियाद हैं।
आयतुल्लाह का सिलसिला, मर्जा का सिलसिला खत्म होने वाला नहीं है। इस्लाम को मिटाना आसान नहीं। जैसे आयतुल्लाह खुमैनी पैदा हुए, वैसे ही नए आयतुल्लाह आते रहेंगे – जो जंग के आगे सिर नहीं झुकाते, घर पर इत्मीनान से बैठते हैं, न भागते हैं, न बंकरों में छिपते हैं। वे जालिम से हाथ मिलाने या सर झुकाने से बेहतर इज्जत की मौत चुनते हैं, क्योंकि शहादत उन्हें ज़िंदगी देती है, इज़्ज़त और मर्तबा देती है और अल्लाह के सामने सुर्खरू करती है।
आयतुल्लाह खामनेई शहीद हो गए, लेकिन आज दुनिया भर में उनके लिए लोग रो रहे हैं। सड़कों पर मुस्लिम समुदाय इकट्ठा है – यह सिर्फ पाकिस्तान, भारत, इराक में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में है। यह मरने के बाद की असली कामयाबी है। जो जिंदा रहते लोग उससे मिलना चाहें और मरने के बाद उसके लिए आँसू बहाएँ।
ईरान की जनता और मुस्लिम उम्माह को सलाम जो अत्याचारियों के आगे झुके नहीं ।



