ज़की भारतीय ✍🏼
उत्तर प्रदेश के संभल जिले में क्षेत्राधिकारी (सीओ) कुलदीप कुमार का हालिया बयान सोशल मीडिया और समुदायों में व्यापक विवाद का विषय बन गया है। ईरान-इजरायल संघर्ष के संदर्भ में मुस्लिम समुदाय द्वारा शांतिपूर्ण तरीके से व्यक्त भावनाओं पर उन्होंने तंज भरे शब्दों में कहा कि “ईरान के लिए छाती पीटने वालों का बढ़िया इलाज करूंगा”, “फ्लाइट पकड़कर ईरान जाओ” और “खुजली मच रही तो इलाज कर देंगे” जैसे वाक्य प्रयोग किए। यह बयान शांति समिति की बैठक में दिया गया, जहां अलविदा जुम्मा और ईद-उल-फितर की तैयारियों पर चर्चा हो रही थी।
यह भाषा न केवल असंवेदनशील है, बल्कि एक विशेष समुदाय को निशाना बनाती हुई प्रतीत होती है। मुस्लिम समुदाय ने मस्जिदों, इमामबारगाहों और निर्धारित स्थानों पर शांतिपूर्ण तरीके से अपनी भावनाएं व्यक्त कीं। कहीं सड़क जाम नहीं हुआ, न ही कोई हिंसा हुई, और न ही भारत की विदेश नीति या आंतरिक शांति को कोई खतरा पहुंचा। फिर भी, ऐसी तीखी और धमकी भरी भाषा का इस्तेमाल क्यों? सवाल यह उठता है कि क्या पुलिस अधिकारी का दायित्व सभी नागरिकों की समान सुरक्षा सुनिश्चित करना है या एक समुदाय को विशेष रूप से लक्षित करना?
दोहरा मापदंड: हिंदू संगठनों के प्रदर्शनों पर खामोशी
भारत में आए दिन कट्टरपंथी हिंदू संगठनों द्वारा सड़कों पर बिना अनुमति प्रदर्शन, जाम लगाना और मुस्लिम विरोधी नारे लगाने की घटनाएं आम हैं, लेकिन उन पर ऐसी सख्त चेतावनी या तत्काल कार्रवाई कम ही देखने को मिलती है। उदाहरण के लिए, बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठन अक्सर सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन करते हैं, जहां मुस्लिम विरोधी नारे लगाए जाते हैं, वाहनों को क्षति पहुंचाई जाती है या हिंसा की घटनाएं होती हैं। दिल्ली के उत्तम नगर में हाल की घटनाओं में बजरंग दल ने सड़कें जाम कीं, वाहनों को आग लगाई और पुलिस के साथ झड़प की, लेकिन ऐसी भाषा में कोई अधिकारी “फ्लाइट पकड़ो” या “इलाज कर देंगे” जैसा कुछ नहीं कहता।
इसी तरह, विभिन्न स्थानों पर हिंदू संगठनों द्वारा मजारों या मकबरों पर भगवा झंडे लगाने, उन्हें तोड़ने या प्रदर्शन करने की घटनाएं सामने आई हैं। फतेहपुर जिले में नवाब अब्दुल समद के मकबरे पर हिंदू संगठनों ने भगवा झंडा फहराया, मजार को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की और बवाल मचा दिया। प्रयागराज की गाजी मिया दरगाह पर भी भगवा झंडा लहराकर नारे लगाए गए। इन मामलों में कानून-व्यवस्था का नामोनिशान तक नहीं रहा, मजारों पर चढ़कर प्रदर्शन हुए, झंडे उतारे गए और नए लगाए गए, लेकिन संबंधित अधिकारियों से ऐसी आपत्तिजनक या तंज भरी टिप्पणियां नहीं सुनी गईं।
यह दोहरा मापदंड स्पष्ट रूप से भेदभावपूर्ण है। पुलिस का प्राथमिक दायित्व सभी समुदायों के लिए समान शांति बनाए रखना है, न कि एक तरफा धमकियां देकर विश्वास की खाई पैदा करना। जब हिंदू समुदाय श्रीलंका या पाकिस्तान में हिंदुओं पर अत्याचारों के खिलाफ भारत में छाती पीटता है या विरोध करता है, तो कोई अधिकारी “फ्लाइट पकड़कर वहां जाओ” नहीं कहता। धर्म के आधार पर एकजुटता दिखाना दोनों समुदायों के लिए स्वाभाविक और वैध है। मुस्लिम समुदाय का ईरान में धार्मिक नेताओं या निर्दोषों पर अत्याचार के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध भी उसी भावना से जुड़ा है।
संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन और जांच की आवश्यकता
भारतीय संविधान अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की आजादी प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता और भावनाओं की रक्षा की गारंटी देता है। ये अधिकार सभी नागरिकों के लिए बराबर हैं। यदि प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण थे और कोई शांति भंग की आशंका नहीं थी, तो सीओ का बयान अनुचित और पक्षपातपूर्ण लगता है। यह एक विशेष समुदाय को अपमानित करने वाला है और समाज में अविश्वास पैदा कर सकता है।
ऐसे बयानों से पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।
क्या यह बयान उच्चाधिकारियों की मंशा को दर्शाता है या व्यक्तिगत पूर्वाग्रह?
उच्च पुलिस अधिकारियों और राज्य सरकार को इस पर तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। जांच होनी चाहिए कि क्या यह भाषा सेवा नियमों का उल्लंघन है। यदि आवश्यक हो तो उचित अनुशासनात्मक कार्रवाई हो, ताकि सभी समुदायों में पुलिस पर विश्वास बना रहे।
समानता और संवेदनशीलता की जरूरत
भारत एक सेक्युलर राष्ट्र है, जहां सभी धर्मों और समुदायों की भावनाओं का सम्मान अनिवार्य है। एक अधिकारी का बयान यदि तंज भरा और धमकीपूर्ण है, तो वह न केवल व्यक्तिगत स्तर पर गलत है, बल्कि संस्थागत स्तर पर भी चिंता का विषय है। मुस्लिम समुदाय ने मर्यादा में रहकर अपनी आवाज उठाई, ठीक वैसे ही जैसे अन्य समुदाय अपने मुद्दों पर करते हैं। दोनों तरफ संवेदनशीलता बरतनी चाहिए।
सीओ कुलदीप कुमार के बयान ने एक बार फिर साबित किया कि भारत में हिंदू-मुस्लिम मुद्दों पर जहर घोला जा रहा है, जहां एक पक्ष को छूट मिलती है और दूसरे को दबाया जाता है। यदि हम वाकई समानता चाहते हैं, तो पुलिस और प्रशासन को निष्पक्ष रहना होगा। अन्यथा, ऐसे बयान समाज को और विभाजित करेंगे। उच्चाधिकारियों को चाहिए कि इस मामले में निष्पक्ष जांच और कार्रवाई करें, ताकि संविधान के मूल्यों की रक्षा हो और सभी नागरिक सुरक्षित महसूस करें।



