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क्या आप सहमत हैं

हम पत्रकार हैं, जब हम समाज का दर्पण हैं तो क्या हमारी जिम्मेदारी सिर्फ खबरें दिखाना और लिखना ही है ? नहीं, कदापि ऐसा नहीं।समाज में मनुष्य जानवर से भी बदतर होता जा रहा है।भाई-भाई का शत्रु हो रहा है,संपत्ति के लिए परिवार में युद्ध हो रहे हैं, पत्नि के कहने पर पुत्र अपने माता-पिता को छोड़ रहा है,वो माता पिता जब तुम बोल भी नहीं सकते थे तो वो तुम्हारी भूख और प्यास को एक पल में भाप लेता था,तुम्हे जिसने चलना सिखाया,बोलना सिखाया,तुम्हे शिक्षित किया ताकि तुम इंसान बनों लेकिन आजकल ही नहीं संसार के निर्माण के बाद से ही मनुष्य से बेहतर जानवर नज़र आए लेकिन इंसान जानवर हो गया।आज थोड़ी परेशानी से जंग न करके किसी को लूट लेना क्या मानवता है,ज़रा से विवाद में किसी को जान से मार देना क्या वीरता है,क्या सत्यता से मुहं मोड़कर असत्य का साथ देना पत्रकारिता है, क्या मनुष्य को मानवता के लिए प्रेरित करने का अधिकार हमें नहीं ? किसी का कोई भी धर्म हो लेकिन हर धर्म का आधार मानवता है।भले ही हम उस आधार से हट गए हों लेकिन इन्सान को फिर से इंसान बनाने के लिए सभी धर्मगुरुवों ओर हमको आगे आना होगा।साम्प्रदायिकता के रोग को जड़ से मिटाना ज़रूरी है,क्योंकि ये दीमक की तरह हमारी एकता की लकड़ी को खाता जा रहा है।
देश मे अधिकतर पत्रकार वो लेख लिखते हैं जो जनता को जानकारी देने के लिए होते हैं। कोई किसी मुद्दे के विरुद्ध लिखकर अपने क़लम का लोहा मनवाने में प्रयासरत है तो कोई उसी मुद्दे के पक्ष में लेख लिखकर अपने क़लम की रोशनाई को कागज़ के बेजान पृष्ठ पर चलाकर उसे आत्मा देने का काम कर रहा है। प्रश्न ये है कि किसी मूल मुद्दे को पत्रकार सही और ग़लत कैसे लिख देता है।अगर सूरज है तो उसे सब सूरज ही कहेंगे।दरअस्ल हम लोगों में भी लोग स्वार्थी हो गए हैं ।कोई किसी राजनीतिक दल का सदस्य हो गया है तो कोई किसी दल का। ऐसे में हमें आत्ममंथन करना होगा।जिसके बाद हम सरकारी पत्रकार या मुखबिर न रहें , अपने भारत के लोगों का दर्पण बन सकें। ऐसे लेख या समाचार लिखें जिससे जानवर के भेष में इन्सान को इन्सान बना सके। इस पुण्य कार्य से शायद हम लोगों का परिश्रम सार्थक हो सके और हमारे देश मे क़ानून व्यवस्था खुद ही सुधर जाए।ये कोई मुश्किल कार्य नहीं है,क्योंकि हमारे सामने कर्नाटक के बैंगलोर के निकट एक क़ब्ज़े अलीपुर में कोई एक चौकी या थाना तक नहीं है।जानते हैं क्यों? क्योंकि वहाँ की सोई हुई जनता को वहां के बुद्धजीवियों ने ऐसा जगाया की वहां की लगभग 50 हज़ार जनता प्रेम के साथ रहती हैं।मैं जब बैंगलोर गया और चिप्स खाने के बाद उसका खाली पैकेट ज़मीन पर फेंका, तो एक युवक ने वो उठाया और मुझसे पूछा कि सर क्या आप बिहार या यूपी से हैं ?ये कहकर उसने वो खाली पैकेट नज़दीक के डस्टबीन में फेंक दिया।मुझे इतनी ग्लानी हुई के आज तक मैने उस ग़लती को दुबारा नहीं दोहराया। इसी तरह यदि लोगों को जाग्रत किया जाए तो ऐसा नहीं के देश भयमुक्त या स्वच्छ भारत न बन सके।

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