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कोरोना वायरस के कारण नहीं उठेगा 19 रमज़ान का जुलूस: मीसम ज़ैदी

लखनऊ, संवाददाता। 19 रमज़ान को पुराने लखनऊ में स्थित मस्जिद -ए- कूफ़ा से निकलने वाला ग्लीम का ताबूत इस वर्ष कोरोना वायरस के प्रोकोप के कारण स्थगित कर दिया है। बताते चलें कि ये ऐतेहासिक ताबूत सन 1930 से निकाला जा रहा था,90 वर्षों से निकलने वाले इस जुलूस को पहली बार सजाया भी नहीं जा सकेगा। इस बात की जानकारी आज शिया धर्मगुरु मीसम ज़ैदी ने अपने निवास पर आयोजित एक प्रेस वार्ता के दौरान दी है।
इस प्रेस वार्ता में धर्म गुरु मीसम ज़ैदी के बड़े भाई अधिवक्ता व धर्मगुरु मुत्तक़ी ज़ैदी भी उपस्थित थे।धर्मगुरु मीसम ज़ैदी ने दिए अपने बयान में जानकारी दी है,रमज़ान के आगाज़ से पूर्व ही प्रशासन द्वारा भेज गया नोटिस उन्हें प्राप्त हुआ था,जिसमे कोरोना वायरस के कारण 19 वीं रमज़ान के जुलूस को निकालने के लिए मना किया गया था। उन्होंने पूछे गए प्रश्न के उत्तर में कहा कि हम अपने दिल पर पत्थर रखकर ये एलान कर रहे हैं कि इस बार हज़रत अली (अस) की शहादत की याद में उठने वाले ताबूत कोरोना वायरस की वजह से नहीं निकाला जाएगा। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि मैं कोरोना से डरकर नहीं बल्कि प्रशासन के आदेश का पालन करते हुए ताबूत नहीं निकाल रहे हैं। उन्होंने कहा 90 वर्षों में पहली बार इस ताबूत को हम मस्जिदे कूफ़ा में सजा भी नहीं सकेंगे,क्योंकि प्रशासन की ओर से इसकी भी आज्ञा नहीं दी गई है। उनसे जब प्रश्न किया गया कि आप ये जुलूस क्या कोरोना वायरस के डर की वजह से नहीं उठा रहे हैं या प्रशासन के आदेश के कार्सन ?जवाब में उन्होंने कहा कि हम लोग अहलेबैत (अस) पर अपने को कुर्बान करने में कभी पीछे नहीं रहे हसीन लेकिन हम लोग ये नहीं चाहते कि हमारी वजह से किसी दूसरे की जान को ख़तरा हो जाए। उन्होंने हज़रत अली (अस) के चाहने वालों से अपील की है कि वो लोग तीन दिन तक हज़रत अली (अस) का ग़म अपने – अपने घरों में मनाएं और हज़रत पैगम्बर मोहम्मद मुस्तुफा (स.अ.व.व) को पुरस पेश करें।
क्या है ग्लीम का ताबूत
दरअस्ल ग्लीम कम्बल को कहते है।हज़रत अली (अस) जब 19 रमज़ान को मस्जिदे कूफ़ा नमाज़े फज्र पढ़ाने गए तो भाड़े का हत्यारा अब्दुर्रहमान इब्ने मुलजिम मस्जिद में ज़हर में डूबी हुई तलवार लिए हुए सोने का बहाना किये हुए मस्जिद में था। हज़रत अली (अस) जब नमाज़ पढ़ाने लगे और सजदे में गए तब इब्ने मुलजिम ने जहर में बुझी तलवार हज़रत अली (अस) की गर्दन पर मार दी ,वो ज़ख्मी हो गए और उन्हें कंबल में लिटाकर घर ले जाया गया। इसी कंबल में लिटाकर ले जाने की याद में ये ग्लीम का ताबूत निकाला जाता है। ग्लीम का मतलब कंबल और ताबूत का मतलब जनाज़ा(शव) होता है।

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